Monday, November 23, 2009

दहशत.............!!!!!!!

गैर को चाहती हो
तो क्या हुआ
मुझे उज्र नहीं
सारा शहर हो तेरा दीवाना !!!
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मैं भी दे सकता था
तेरी बात का जवाब
फ़िर दिल में ख्याल आया
औरत के मुंह कौन लगे

एक बार उनकी वफ़ा
आजमाने को
उनको साथ ले जाना
चाहता था

पहले न जानता था ki
वो खानदानी आदमखोर थी
और मैंने सिर्फ़ सत्रह
सिर्फ़ सत्रह ईद देखी थी

नतीजा_
मेरे नाम की सुपारी
अपने भूतपूर्व यार को दी
जो अपने गिरोह का सरगना था

पर वह ख़ुद ही मुझसे
बयान कर चुकी थी
अपने प्राचीन प्रेम का
इतिहास
और मुझसे भी निस्बत
रखती थी

ये जात ही कुछ ऐसी है
जिसका कोई सानी नहीं है
जिसको das ले उसके लिए
कहीं पानी नहीं है ।
इरादे नेक हो भले अपने
दिखायेंगे ये जौहर ही अपने

साफ़ कह दिया मुझसे
मुझे घर से निकलने वाले
कितने आए और चले गए
देख loongee एक_एक को
जो कहते हैं अपने को दिल वाले
हम भी इनसे दूरी बरकरार रखते हैं
पास आ भी जायें तो
चार कदम हम पीछे hatate हैं

याद हैं मुझे मेरे बाप ने
rugdd शैया पर
अन्तिम बार ये अलफ़ाज़ कहे
जिंदगी में बेटा सिर्फ़ चार
सिर्फ़ चार से परहेज रखना
औरत , वकील, पुलिस और नेता
वरना कहीं के न रहोगे .

पर ये नसीहत जब तक मुझे मिली
तब तक मैं chaak गरेबान हो चुका था
उसके बाद फ़िर मैं
अपने बाप से मिल नहीं पाया
शायद वो कुछ और
खुलासे करते
किसी ने उनका गला दबा दिया था ।

और मैं उनकी बात का
गूढ़ अर्थ खोज रहा हूँ
अमल उनकी बात पर
रख रहा हूँ ।
इन चार में सिर्फ़ एक
सिर्फ़ वही पुश्तैनी थी
baaki से मेरी माँ ने रिश्ते बनाये थे
फ़िर भी मेरी चौदह वर्षीया
बिटिया से उन्होंने कहा था

कभी किसी ला grajuyet
से शादी न करना
भले वो ucchha पदस्थ
adhikaari ही क्यो न हो

ऐसे ऐसे रिश्ते सौगात
में मिले
जो उनके गुज़रते
यक_बा_यक टूट गए
ख़ुद ही मेरा दामन छोड़ गए

अब मैं तनहा हूँ
और अपनी आत्मा से
ये सवाल पूछता रहता हूँ
आख़िर मेरे बाप ने
ऐसा क्यों कहा था ???

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ahale दिल जो चाहे सज़ा दे मुझे

अपने दामन में jhaank के देखे पहले
मेरे नयन ख़ुद बखुद dabdabayenge
गरज के तो वो देखें पहले।

Friday, November 20, 2009

बिन मौसम ही ........!!!!!!

अजी आली जनाब आए हैं
हाथों में खाली गिलास लाये हैं
अभी भर जायेंगे पैमाने
आंखों मे वो शराब लाये हैं ।
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तुमसे मुलाक़ात बरसों बाद हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

पहले की तरह तुम्हारा हाथ चूमना चाहा
पर तुम अपनी जगह से हट गई
तुम बदल गए हो या मैं ही
गिला होठों में आकर अटक गयी ।
पूछा ऐसे तुमने क्यों होने दिया
मुहब्बत रस्मोरिवाज़ मे भटक गयी ।

महफ़िल में फ़िर हसीं रात हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

मेरा पैमाना फ़िर भरा तुमने
जाम लबों से लगाया तुमने
नज़र झुका के ही बात की
ख़ुद पीने की बात से किया इनकार तुमने
मैं भी पीने की बात से मुकर गया
ख़ुद पिलाने से हाथ खींच लिया तुमने

बिन मौसम ही चमन दिल मे बरसात हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई

बरसो रहे तुम गुमशुदा सबसे
अब मिले तो हो के शादीशुदा हमसे
ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाया या बारे गम
ये राज़ भी तुमने छुपाया हमसे
पहले भी क्या हम इतने गैर थे
बिना पूछे ही सब कुछ कहती थी मुझसे

अब तो दुश्मन सारी कायनात हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

पहले तो साथ मेरे हर कहीं जाती थी
रेस्तराओं में बैठ कर लिम्का पीती थी
मेरे साथ मीठा पान अक्सर खाती थी
मर्ज़ी से अपने सारे प्रोग्राम बताती थी
तुम मेरी अपनी ही हो ................
बात बात में ये बात जतलाती थी

भड़कते शोलों पर मुहब्बत परवान हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

फिसलन...... !!!!!!

मंजिल तक वो नहीं पहुचते
जो आगाज़ से ही डर जाते हैं ,
मट्ठा भी फूंक_फूंक कर पीते हैं
हैफ ! लोग दूध से भी जल जाते हैं ।

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बाहों में आना ज़रूरी था अगर ,
होंठ से होंठ क्यो न मिल गए ।

फिसलना इश्क मे मुनासिब था अगर ,
फिसलते_फिसलते क्यो संभल गए ।

अपना समझ कर क्या भूल हुई
तुम गैरों में फ़िर क्यों भटक गए ।

संगीन तो न था मामला इतना
फ़िर क्यो न लौटे देर रात गए ।

अफलातून हैं आप फ़ोन न उठा सके ,
हम किस से कहें वो वादे से फ़िर गए ॥

कहते रहे वफ़ा की राह लम्बी नहीं ,
फ़िर आप क्यो न पहले ही बिछड़ गए ।

चांकगरेबान ही होना था तुमको 'रतन'
ख़ुद को तुम अपनी लगा नज़र गए