Wednesday, October 24, 2012

naman mitra naman tumko

मेरी दोस्ती का दम भरने  वाले 

शहर में हैं बहुत मेरे  दोस्त 

पर एक भी ऐसा नहीं जो 

वक़्त-ए -जरूरत सामने आये 

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कर्ण और कृष्ण 
महाभारत समर में 
दोनों का काम था 
अश्वसेवा 

एक जतिकुल हीन 
एक भगवान् कहाया 
दो माताएं दोनों की थीं 
पर भगवान् निर्मम हो 
जानते हुए सब कुछ 
अनजान बने रहे 

वक़्त कुटिल जान कर 
कर्ण को उसका वंश बताया 
विधि ने बार बार छला 
कर्ण को प्रण से डिगा न पाया 

निष्ठुर माँ ने जाना जब 
समर आने वाला कितना विकराल 
सगे पुत्र को अपनी करतूत सुनाया 

पर दानी कर्ण ने 
न ठुकराया न अपनाया 
दिया दान पांच बेटे सदा रहेंगे 
मिला अवसर भी तो पार्थ छोड़ 
न किसी और का वध करूंगा 

पर किसी तरह भी 
न मित्रद्रोह करूंगा 
सहज ही मृत्यु वरण करूंगा 
अगर इन्द्रसुत को न मार गिराया 

'नमन मित्र नमन तुमको 
तुम्हे शत-शत प्रणाम 
तुम सा युद्धवीर देखा किसने
तुम सा परममित्र पाया किसने 

तुम सा उदाहरण 
शिवि ,दधीचि न दे पाए 
अपना बदन छील कवच
छली इन्द्र का पकड़ाया 

पहचाने  जाने पर इन्द्र सकुचाया 
बदले में अमोघ शक्ति 
तुमको पकड़ाया 
तुमने मृत्यु समय भी दिया ही 
जीवन भर किसी से कुछ न माँगा 

आज तक इतिहास में 
ऐसा चरित्र न कोई रच पाया 
तुमसा दानी और परममित्र ,
न देखेगा न पाएगा 

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