Monday, November 12, 2012

doosra mahabharat hone ko hai

कौन करेगा अब 
भ्रष्टाचार के खिलाफ 
सच का सामना 
है यह ध्रुव सत्य 
जो आगे बढ़ा सच के लिए 
खींच लिए पैर उसके 
और वो धराशायी हो 
ओंधे मुह ज़मीन पे गिरा 


सच है सत्ताधीशों के पास 
है हर मर्ज़ का इलाज़ 
जानते हैं अच्छी तरह 
कब है इसका इस्तेमाल करना 
पर इतिहास खुद को दोहराता है 
सत्ताधीशों को 
सत्ताविहीन कर देता है 


याद है अस्सी के दशक 
के प्रारंभिक चार  साल
की वो सम्पूर्ण क्रांति 
कितने वीर नौनिहाल 
जेलों में ठूस दिए गए
पब्लिक स्कूलों को 
जेल बनाया गया 

कितने सपूतों ने कुर्बानी दी 
कितनों पर तोहमत लगाई गयी 
वह युग जनजागृति का था 
तानाशाहों के मंसूबों पर 
पानी फिर गया 

और इतिहास में 
आदिम युग के आज तलक का 
ढाई साल का पहली बार 
और शायद आखिरी  बार
स्वर्णयुग आया 
नयी सौगातें लाया 
प्रजा प्रसन्न वदन थी 
महंगाई का नाम न था 
कम से कम रोटी ,
कपड़ा और मकान के लिए 
जनता खस्ता हाल न  थी 

हर तरफ रामराज था 
कहते हैं सतयुग जिसे 
वह बद से बदतर था
सच तो ये है 
सतयुग कभी था ही नहीं
भ्रष्टाचार का बोलबाला 
तब भी था 
लोग आदिम थे 
अन्धविश्वासी थे 

आदिम धर्मग्रन्थ ऋग्वेद 
जिसे श्रृष्टि की उत्पत्ति 
के बाद का पहला धर्मग्रंथ
बताया गया ,हास्य परक 
 कि ईश्वर की रचना है 
जो झलक मिलती है 
उससे अंतरात्मा काँप उठती है 

ब्राह्मणों की तोंद की खातिर 
रची गयी उस रचना के लिए 
ईश्वर के नाम पर 

लोगों को ठगना 
और जांति -पांति के नाम का 
ढोल पीटना 
यह गन्दगी श्रृष्टि की उत्पत्ति 
के साथ चली आती है
और नेस्तनाबूद तो कभी 
हो भी सकती है 

उसके लिए रन बाकुरों ने 
कमर कसी 
सबने कहा भ्रष्टाचार गलत है 
सबने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई 
सत्ताधीशों और अपनों को 
लगाने वालों ने 
झूठे वादे किए 
आश्वासन लिखित दिया 

और अपने हाथों अपने माथे पर 
कलंक विजय का टीका लगा लिया 
वादाखिलाफी की समाज के साथ 
और एक अंतहीन मर्यादा 
का उदहारण दिया 

'अहिंसा परमो धर्म: ' कह कर 
क्या हमें आज़ादी मिली है 
अहिंसा-अहिंसा करने वाले लोगों ने गोली खायी 
अहिंसा जपते-जपते बौद्धों ने गर्दन कटवाई 

आज सुभाष ,भगत,बिस्मिल
को हमने भुला दिया 
स्वतंत्रता-दिवस मानते हैं 
और गीत अंग्रेजों के गाते हैं 
गाँधी ने नारा दिया 
'अंग्रेजों भारत छोडो' 
पर है कोई माई का लाल 
यह कहने वाला 
भ्रष्टाचारियों विदेशों से 
काला धन वापस लाओ 
    
आज यदि देश क़ुरबानी 
को भुला देगा तो मैं नहीं समझता 
भ्रष्टाचारियों की सेना के सामने 
भीष्म्प्रणधारी  शरशय्या पर 
सोने को मजबूर न होता 

धर्मराज को झूठ बोल कर 
कर्ण से चाल खेल कर 
बालब्रह्मचारी के सामने 
'शिखंडी' को भेजकर     

यदि युद्ध जीतना कला है 
तो वाकई हमारे शासक 
कुलीनता के धारक हैं 

एक महाभारत हो चूका 
दूसरा अब होने को है ..
{
  जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन  के संचालक तथा    सम्प्रति 'आज़ादी बचाओ 'के संस्थापक बनवारी लाल शर्मा के आकस्मिक निधन के बाद उनको स:सम्मान समर्पित .............................................}
                                                --राजीव 'रत्नेश' 


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