अभियान ( वक्तव्य)
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हम दोनों बलिया शहर के मेन मार्केट" शहीद पार्क" की एक चाय की दुकान पर बैठे चाय पी रहे थे/
तथाकथित समाज में फैले विद्वेष और नफरत के कारणों का अपने मुहिम के तहत तलाश रहे थे/ तभी
एक लंबोतरे चेहरे वाला, सींकिया रिपोर्टर हमारे पास आया और अपना परिचय देकर मेरा परिचय पूछा/
मैंने साफ किया कि हम जे ० पी ० मूवमेन्ट के अदना प्रहरी हैं और उसी की खबरनवीसी के लिए सड़क- दर- सड़क, दुकान- दर- दुकान, गाँवों और शहरों की खाक छान रहे हैं/ उसने हमारा हेडक्वार्टर पूछा फिर भी न चाहते हुए भी मैंने उसे' सर्व- सेवा- संघ, वाराणसी' बताया क्यूँकि मेरे साथ की चंदा तो वहीं से
संबंधित थी/ उसने चंदा का उत्सुकता और उत्कंठा के
जुड़वा भाव से निहारा और प्रश्नों की झड़ी लगा दी/
उसने चंदा का पूरा नाम और पता जानना
चाहा/ मैंने उसे हटाने की गरज से सिर्फ इतना ही कहा--' हमारा चाहे जो भी संबंध हो, इतना तो निश्चित है कि वह तुम्हारी बहन भी हो सकती है/' यह सुन कर वह सटपटा गया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया/ बीच-बीच में वह हमारे बलिया- प्रवास के दौरान हमसे
मिलता रहा और अपने पेशे से संबंधित सवाल भी दागता रहा और हमारी जानकारी को डिटेल में जानने
का प्रयास भी करता/ पर मैंने उसे कभी निराश नहीं किया और जब तक हम बलिया में रहे, उसे अपना पूरा सहयोग दिया/ वह हमारे अभियान की दिशा में ही एक सार्थक प्रयास था/
बलिया के एक छोटे से गाँव में मेरा पैतृक आवास भी है जो सरयू नदी के किनारे स्थित है और बलिया शहर में बनकटा मुहल्ले से सटी गंगा प्रवाहमान है, वहीं मेरी ननिहाल है /
हम दोनों हफ्ते- दस दिन पर बनारस जाते और अपनी रिपोर्ट वहाँ के संचालक को सौंप देते/ तब संचार- व्यवस्था का कोई शीघ्रगामी साधन नहीं था/ इसी सिलसिले में मुझे अपने शहर इलाहाबाद में' नगर- स्वराज्य' अखबार के आफिस
' देश सेवा प्रेस' जाना होता था और मूवमेन्ट से संबंधित सभी दोस्तों से चर्चा भी हो जाती थी/ इस दौरान चंदा बनारस चली जाती थी और वहाँ की व्यवस्था देखती थी/ लौटती में उसके माँ-पिताजी की
अनुमति से उसे लेकर मैं बालिया अपने गाँव चला जाता था/
जहाँ कहीं मैं जाता, चंदा मेरे साथ ही
होती थी/ पर कैसे? यह शायद पाठकों की उत्सुकता
जानने-समझने की होगी और मैं अपने प्रिय पाठकों से
कभी कुछ नहीं छिपाता/
यह मैं सर्वविदित करना चाहता हूँ कि मेरी और चंदा की मुलाकात मेरे शहर इलाहाबाद में संपादित' अखिल भारतीय सम्मेलन' से ही थी/ जहाँ आठ या दस दिन का वह सम्मेलन निरंतर' लोकनायक जय प्रकाश नारायण' के भाषणों से कृत- कृत्य हो रहा था, जिन्होंने ट्रस्टीशिप स्थापना के माध्यम से" संपूर्ण-
क्रांति" का आवाहन नवजवानों से किया था/ यह पूरे देश में जनता पर थोपी गई इमरजेन्सी के खिलाफ पूरे विद्रोह का एजेंडा था/ हर कोई इस सामंती व्यवस्था से तस्त था/ सारे बुद्धिजीवियों को जेलों में बंद कर दिया गया था/ जेल भर गए तो स्कूलों कालेजों को वैकल्पिक जेल बनाया गया था/ कितने ही साहित्यकार, प्रोफेसर, कवि और चिंतक उन जेलों में से किसी जन- नायक के इंतजार में अपनी बूढ़ी हड्डियों में साँसों का संचार बनाए हुए थे/
मैं इस महा- अभियान में अपनी तुच्छ सेवा देने के लिए, अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई को
तिलांजली देकर इस समरक्षेत्र में कूद पड़ा था/
एक साधारण कार्यकर्ता की हैसियत से मैं वहाँ बुद्धिजीवियों के लिए अपनी सेवाएँ देने के लिए तत्पर हुआ था/ मेरी तरह सभी वहाँ कार्यकर्ता ही थे/
छोटे- बड़े का कोई सवाल नहीं था/
आगंतुकों को स्टेशन, अपने सहयोगियों के साथ जाकर रिसीव करना तथा सम्मेलन- स्थल पर
पहुंचा कर उनकी देखभाल और सेवा- परिचर्या करना मेरी मुख्य तैनाती का विषय था/ बाहर से आने वाली बसों के आगन्तुकों को रूम आदि की व्यवस्था तथा
सुराही और गिलासों की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा सुब्ह का नाश्ता, दिन और रात का खाना उन्हें
खिलाना मेरी ड्यूटी में शामिल था/
यहाँ मैं यह बताना जरूरी समझता
हूँ कि मैंने अपनी शुरुआती जिन्दगी से लेकर आज तक कोई भी काम वेतन, मेहनताने या प्रसिद्धि या लालचवश कभी नहीं किया/ ऐसे कार्यों से मुझमें नवऊर्जा का संचार होता था, पाठक यही समझ लें और पूरी अभिरुचि से उसमें भाग लेता था/ अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए भी मैं अपने पिताजी पर ही
आश्रित था/ साथ में तीन ट्यूशन भी करता था और अपना खर्च चला लेता था/ जब कभी आवश्यकता हुई तो माताजी से ही मांगता और मुझे कभी भी निराशा का सामना नहीं करना पड़ा/
एक कुशल सहयात्री के रूप में चंदा की मुलाकात मुझसे कैसे हुई, उसे स्पष्ट न करना अब असहज हो रहा है और मैं पूरी ईमानदारी से इस तथ्य को दोस्तों की मजलिस में स्पष्ट करने का इरादा रखता हूँ/ पहले दिन जब मैं अपनी ड्यूटी संभालने में व्यस्त था, मुझे अपने इलाहाबाद के संयोजक प्रोफेसर शर्मा जी का आदेश मिला ,' रतन! जाओ, मेहमानों को खाना खिलाओ'/ मैं तत्परता से रसोई की व्यवस्था देखने गया/ मुझे ज्ञात हुआ कि हलवाई तो लगा हुआ जरूर है पर आटे, दाल, सब्जी, घी वगैरह कुछ भी क्रय नहीं किया गया है और न ही किसी से भी कोई
चंदा या मदद ली गई है/ हुआ यह था कि जितने भी सहयोगी या वालंटियर थे उनकी यह व्यवस्था थी कि सभी अपने- अपने घरों से राशन वगैरह लाए थे, जिससे जो बना कोई घी, कोई चावल, कोई सब्जी अपने बूते से लाया था और पूरे सम्मेलन तक यही व्यवस्था लागू रहेगी/
मैं भी पूरी मुस्तैदी से खाना परोसने में लग गया/ बहरहाल मैं सब्जी या दाल ठीक से याद नहीं कि पूड़ी थी कि रोटी थी क्यूँकि इन घटनाओं को बीते पचास सालों में क्रम से याद कर पाना मेरे लिए सहज नहीं है, जो कहीं व्यतिक्रम हो जाए तो पाठक
मुझे क्षमा करेंगे/ एक हाथ में बाल्टी या टोकरी लेकर आगे बढ़ा और पंगत में बैठे अभ्यागतों को सर्विस देने लगा/
तभी मुझे एक आवाज सुनाई पड़ी/ कोई मुझसे ही मुखातिब था और मुझसे कह रहा था,
' भाई साहब! मेरी बुआ को नमक और मिर्च सही-सही दीजिएगा/ नहीं तो ये आपको अपना डान्स नहीं दिखाएँगी'/ मेरी नजर उधर गई तो एक सोलह- सत्रह साल की कोमलांगना मुझसे अपनी बुआ की ओर इशारा करती हुई कह रही थी/ मैंने उनकी ओर गौर से देखा और,' जरूर-जरूर' कह कर उनके आगे हाथ की चीज सर्व कर दी/
जब मैं इलेक्ट्रिशियन के साथ कमरों की लाइट व्यवस्था ठीक करवा रहा था, पता नहीं वह मुझसे बातें करने में अति उत्साह प्रदर्शित कर रही थी या जे ० पी० महोदय की बातों से वह स्वयं ही उत्साहित थी/
बहरहाल जब मुझसे वो लान में मिली तो मैंने उसका नाम पूछा/ उसने नाम तो बताया पर दो ही अक्षरों का/ पूरा नाम नहीं बताया और जानना मैंने जरूरी समझा भी नहीं, क्यूँकि उसके पापा के हाथ पर मैंने' रंग नाथ जौहरी' गुदा हुआ देखा था/ मैं जान गया कि उसका पूरा नाम चंदा जौहरी है/
जाति, धर्म या संप्रदाय के नाते मेरा किसी से कोई दुर्भाव नहीं था/ मेरे पास गीता, रामायण के साथ- साथ बाइबिल और कुरान भी है, जो मेरी खोज के विषय है/ अल्लाह या गाड, राम या रहीम मेरे आराध्य हैं/ और मेरी अंतरात्मा सभी में सिर्फ एक रूप का ध्यान करती है, जो मेरे हृदय में अंतर्हित है/ आत्मा और परमात्मा के साथ ही मैं प्रकृति( कुदरत) की एकात्मकता में विश्वास रखता हूँ/ यही कारण है कि
कोई भी परिस्थिति मुझे डरा, सहमा या विचलित नहीं
कर पाती/ मैं सदा-सर्वदा अपने आप में अवस्थित हूँ/
कारमेलिटी में या सहज उत्सुकतावश उसने मेरा नाम पूछा जो मैंने उसे सहजभाव से बता दिया/ मैंने उसका पता पूछा तो उसने कहा,' आप सर्वसेवा संघ' आ जाइएगा, वहाँ मैं आपको मिल जाऊँगी/'
ये तो था उसका प्रथम दृष्टव्या परिचय/ आगे का विवरण ये है कि रोजाना की मुलाकात से मैं उसके परिवार के इतने निकट आ गया था कि उन्हें छोड़ने मैं बनारस तक गया और लौटते वक्त उससे बाय तक न कह सका सिर्फ उसकी तरफ
हाथ हिला कर चला आया/
इलाहाबाद के बाद सम्मेलन लखनऊ
यूनिवर्सिटी में कुछ दिनों बाद हुआ, जिसमें मैं अपने
कतिपय साथियों के साथ सम्मिलित हुआ और एक हफते बाद वापस लौटा/ जहाँ पर मय परिवार चंदा से मुलाकात हुई और अबकी बार मुझे बनारस घर पर
आने का निमंत्रण भी दे गई और अपने माता- पिता
और बुआजी से मिलवाना भी न भूली/
लखनऊ में ग्रुप बना के जोन निर्धारित कर दिए गए थे/ चंदा की सहमति से मैंने
अपना जोन इलाहाबाद से छपरा( बिहार) वाया बनारस, बलिया चुना और इसी सिलसिले में मैं और चंदा बलिया की सड़कों पर भी थे और गाँवों की पतली पगडंडियों पर भी साथ- साथ थे/
यह तो गाँव वालों का मेरे प्रति प्यार है कि अभी भी यदा कदा जाकर मैं अपनों के बीच शहर की आधुनिकता से दूर सरयू नदी की हिलोंरो के बीच अपना दुख-दर्द भूल कर संतुष्टि की अनुभूतियों से घिर जाता हूँ/
उस समय मेरे गाँव में बिजली नहीं थी और लालटेन या तेल वाले लैंप से ही हम लोग अपना काम चलाते थे/ इतना तो मुझे याद है कि शहर में भी मेरे घर रेडियो तो था पर ट्रान्जिस्टर या टी वी
किसी की कल्पना में भी नहीं था/ रेडियो में भी हम लोग रोज हवामहल या विविध-भारती के रंगारंग
कार्यक्रम तथा आल इंडिया रेडियो की खबरें सुनना हमारे रोजमर्रा के नियम थे/
चंदा कई बार मेरे साथ मेरे गाँव
' मतदाता- शिक्षण- अभियान' के तहत गई है और गाँवों की रमणीयता में ऐसा खो गई है कि वह' सर्व- सेवा संघ' की बिल्डिंग तक विस्मृत कर चुकी है/

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