गाँव के घर से करीब दज गज
के फासले पर हमारा बाबा- आजम का गढ़ अवस्थित है, जिसके ऊपर एक हवादार कमरा है, खिड़की में केवल छड़ें ही लगी हुई हैं/ उसमें एक आलमारी सुराही गिलास आदि रखने के लिए बनी हुई है/ एक पलंग भी आरामगाह की दृष्टि से वहाँ लगा हुआ है/
हमारा सेवक वहाँ रोज लड़ू-बुहारू करता है/ हम लोग आते हैं तो निश्चित तौर पर वह हमारी आवभगत के
लिए तत्पर होता है/ गढ़ के चारों ओर गहरी खाई है, जिसमें बरसात में पानी भर जाता है/ एक रास्ता खुला
रखा गया है, गढ़ से घर तक पहुँचने के लिए/ उस खाई में ढेरों पेड़ लगे हुए हैं, जिनमें बहुतायत से ताड़ के पेड़ हैं/ हम वहाँ गर्मियों के मौसम में गए थे और बरसात शुरू होने के पहले निकलने के मूड में हम थे भी नहीं/
हमारे बगीचे में गढ़ एक तरह का टापू है/ हम गढ़ पर ही ठहरे हुए थे/ हरकारे रोज ताड़ी खींचते और दो मर्तबान हमारे कमरे की आलमारी में रख देते/ रोज सबेरे हम अंकुरित चने के साथ ताड़ी पीते थे/ ग्राम प्रवास के दौरान हमारा रोज का यही कार्यक्रम होता था/ दोनों टाइम का खाना आ जाता और हम पानी की जगह ताड़ी प्रयोग में लाते थे/ और
बेसुध होकर सोते थे/ दो सप्ताह में ही मैं तो लाल हो गया था/ चंदा तो पहले से ही लाल थी अब और भी सुर्ख हो गई थी/
हम फुरसत में कभी खेतों की ओर निकल जाते, कभी बाग बगीचों में घूमते और अपने
बगीचे के सुनहरे आम और काले जामुन मँगवाते और कभी साथ भी ले आते/ कभी- कभी रात में हम खेतों के बीच मचान पर बैठते और शीतल हवाओं में चाँद को निहारते हुए, अपनी- अपनी कल्पनाओं में खोकर
सो भी जाया करते थे/ नींद खुलने पर नित्य कर्म के लिए घर पहुँच जाते/
सिंचाई का साधन उस समय कुएँ से रहट से ही था, जिसमें बैल जोते जाते थे और वहीं पास में ही ईरव पेर कर बड़े से कड़ाह में गुड़ बनाया जाता था/ कभी- कभार हम ईरव का रस भी पीते थे और बड़ी शान से कुँए की जगत पर बैठ कर आनंदित होते थे/
दिन में अक्सर हम बाहर ही रहते थे अपनी रिपोर्टिंग के लिए और कभी अपने रिपोर्टर दोस्त से मिलने उसके आफिस भी पहुँच जाते थे/
यथा सामर्थ्य वह आवभगत करता और खबरों का आदान-प्रदान करता/ अपने अभियान के बारे में
हम उसको उकसाते और वद मौजूदा हालत पर
बिफर पड़ता था/ उसके वहाँ होने से हमको भी मसाला मिल जाता था और बिना हींग- फिटकरी के रंग जम जाता था/ चंदा उसे भइय्या कहती, जिससे वह चिढ़कर पेट में की खबरें भी निकाल देता था/
हमारा अभी कुछ दिन और वहीं
टिके रहने का प्रोग्राम था कि इलाहाबाद से मेरा मित्र भारत भूषण बलिया आया और उसने हमारे संयोजक शर्माजी का मेसेज हमें दिया कि इमर्जेन्सी खत्म हो गई है और जेनरल इलेक्शन की घोषणा हो चुकी है/ हमें अब लौट आना चाहिए/
मुझे समझ नहीं आया कि अभी भी हम अपनी मुहिम से कितनी दूर थे/ असली काम
तो अभी बाकी था जन- जन को मताधिकार के लिए प्रशिक्षित करना/ भारत भूषण से अपने लौटने की सूचना मैंने भिजवा तो दी/ पर अभी मेरा दिल लौटने की गवाही नहीं दे रहा था/
रात को मैंने चंदा को बताया कि इलाहाबाद से मेसेंजर आया था और मुझे वापस बुलाया है/ मैंने उसे बताया कि सर्वहारा प्रतिनिधियों से मिलकर उनको उनका कर्तव्य समझाना और रोज कुँआ खोद कर पानी पीने वालों को उनको उनके मत का अधिकार समझाना का मुख्य कार्य तो अभी शेष है/ चंदा ने सुझाव दिया कि हमें आदेश का पालन तुरंत करना चाहिए/ हो सकता है वहाँ कोई नई मुहिम हम लोगों के इंतजार में हो/ बलिया और बनारस हम
फिर आ सकते हैं/ उसकी दूरदर्शिता पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ/ इसी कारण तो उसे मैंने अपना सहयात्री बना रखा था या सच कहूँ तो वह मेरी सारथी थी, जिसके हाथ में मेरे रथ के घोड़ों की लगाम थी और इस महासमर में वह मुझे सलाह दे रही थी/
सुबह होते ही मैंने गाँव वालों से घोषणा कर दी कि कुछ दिनों के लिए हम इलाहाबाद शहर जा रहे हैं/ तब तक अपना- अपना काम मुस्तैदी
से करें/ कुछ दिनों बाद हम फिर लौटेंगे/ हमने अपनी-
अपनी अटैची में कपड़े ठूँसे और कंधे पर गाँधी झोला लटकाए सफर को तत्पर हो गए/
हम लोगों ने इलाहाबाद की धरती पर कदम रखा और सीधे घर गए/ चंदा को देख कर मेरा
छोटा भाई लोट-पोट था/ घर वाले बेहद खुश थे पर
एक बाधा थी कि चंदा उन सब के साथ क्या एडजस्ट
कर पाएगी/ शुरू से मेरे साथ वो स्वतंत्र रूप से रही थी पर अपने कमरे में उसको अपने साथ रखना उचित नहीं था/
माँ ने मुझसे पूछा तो मैंने कहा,' चंदा से ही पूछ लो, शायद उसे तुम लोगों के साथ कोई एतराज न हो'/ पहले से उन लोगों को सूचित करना संभव नहीं था/ क्यूँकि पत्र पहुँचने में महीनों लग जाते था और हमारा आने का प्रोग्राम तो अकस्मात बना था/ उन्हें मैंने चंदा की कैफियत बताई तो उसे अचानक पुत्रवधू के रूप में पाकर वह अंदर ही अंदर प्रसन्न बहुत थीं, जो उन्होंने पिताजी से जाहिर किया/
दूसरी शाम मैं शर्माजी से अपनी उपस्थिति दर्शाने गया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इलेक्शन होने वाला है और असली मुहिम हमारी अब
शुरू होने वाली है/ उन्होंने बताया कि सभी सहभागियों की वो एक मीटिंग रखना चाहते थे सो मुझे बुलवाया था/ और मतदान प्रशिक्षण का अभियान वो चलाना चाहते थे, जिसमें एक बार फिर
हमें एक जुट होना होगा/ हमारे सारे बुद्धिजीवी भाई जेलों से बाहर आ चुके थे/ मैंने उन्हें एवमस्तु कहा और आगे के एजेंडा सुनिश्चित करने को कहा/ मैंने उनसे कहा कि मुझे कुछ दिन के लिए बनारस भी इसी मुहिम की औपचारिकताएँ पूर्ण करने और चंदा की बात उनसे शेयर की/ उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक आज्ञा दे दी और मैं उनका आदेश शिरोधार्य कर बनारस जाने की सोचने लगा/
और माता- पिता की आज्ञा से मैं चंदा को उससे राय करके बनारस आया और शर्माजी की मुहिम की बात सर्वसेवा संघ में प्रचारित करवाने के बाद उसके माता- पितासे आज्ञा लेकर उसे साथ ले इलाहाबाद लौट आया/
सभी वालंटियर घर-घर जाकर लोगों से उनके मताधिकार की बात समझाते और हम सभी इसी तरह आम जनता को प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम चला रहे थे/ इसी तरह इलेक्शन का दिन भी आ गया और हम सभी की मतदान केन्द्रों पर गेट के बाहर ही तैनाती भी हुई/ हमको किसी से भी सिर्फ मताधिकार का प्रयोग करने के सिवा कुछ भी कहने की मनाही थी/
इलेक्शन का नतीजा घोषित हुआ और जनता दल की' जनता सरकार' सत्ता में आई/ भले
अल्पकालिक ही सही, पूरी दुनिया की यह पहली सरकार थी, जिसने गरीबों के बारे में, गरीबों के लिए भी सोचा और अपने प्रयासों से अपने विचार अमल में
भी लाए/ महात्मा गाँधी के राम- राज्य का सपना जो भी रहा हो इस सरकार से बेहतर नहीं था/ भारतीय-
इतिहास का यह स्वर्णयुग था/
हमारे अभियान का असर आज पचास वर्षों के बाद तक भी दिखाई पड़ता है कि प्रधानमंत्री से लेकर एक पार्षद तक, सड़क से लेकर संसद तक हर कोई हर किसी को उसके वोट का महत्व समझाता
है, विपरीत इसके भले ही वोट चोरी होती हो/
" राजनीति तेरा दिमाग एक हाथ हजार"/
जिसके लिए हम और चंदा एक हुए थे,
वह अभियान तो समाप्त हो गया था पर उससे भी भयावह स्थिति आने वाली है, हमने स्वप्न में भी नहीं
सोचा था/ आज की जनता, चुनावों की चक्की में पिसने को मजबूर है पर हमारा अब कर्णधार कौन है,
सही रूप में पहचानना अभी शेष है/
दोस्तों से मिल कर वस्तुस्थिति जानने की मैंने सोची तो पता चला कुछ तो अपने काम-धंधे
से लग गए थे/ कुछ बाहर नौकरी पर चले गए थे/ मौजूद थे तो हमारे संयोजक शर्माजी/ वो भी अब प्रेस
की गतिविधियों में व्यस्त थे/ मैंने सोचा, जिसके लिए मैंने और चंदा ने अपनी जवानी के चंद साल यूँ ही घूम-घूम कर खानाबदोशों की तरह गुजार दी/ अपनी
पढ़ाई को बीच में छोड़कर राजनीति के हवन- कुंड में
झोंक दी/ क्या उस अभियान का यही हस्र होना था/
कोई तो संपूर्ण क्रांति का उत्तराधिकारी होता/देश भ्रष्टाचार से आकंठ लबरेज है/ तमाम
कुरीतियाँ सर उठा कर खड़ी हैं कोई तो अब सांत्वना
का अभियान छेड़ता जो सहभागी जेलों में प्राण त्याग बैठे उनकी अतृप्त आत्माएँ चीख-चीखकर अपनी
जिन्दगी का हिसाब मांग रही हैं/ कौन है जो उनकी
पीड़ा को समझे?
कोई तो होगा खुदा का बंदा, जिसकी रहबरी में हम चलें/
कोई तो होगा खुदा का बंदा, जिसकी ताजपोशी कर
आगे हम बढ़ेंगे/
रास्ता तो बताए, छेड़ फिर से अभियान, आगे खानाबदोशी हम करेंगे//
मैंने चंदा से मशविरा किया तो वह बोली
' अकेले चना भाड़ नहीं फोड़ सकता/'
मैंने छप्पन इंच का सीना तान कर कहा,
' भड़भूजे की आँख तो फोड़ सकता है/'
उसने मुझसे कहा,' जो होना था हो गया अब हम लोग भी अब अपने को समेट लें और कोई दीर्घ योजना न
बनाकर एक दूसरे का हाथ पकड़कर भीड़भरा रास्ता क्यूँ न पार कर लें/ मेरी तो यही राय हमें अब अपने और अपनी जिन्दगी के बारे में सोचना चाहिए/'
एक दिन मैं चंदा के साथ शाम को घूमने
के लिए निकले/ घर से कुछ दूरी पर जमुना प्रवाहमान थीं/ वहाँ बेंच पर बैठकर, एक तो धीर- गंभीर जमुना का शांत पानी, ऊपर से बहती मदमाती हवा में उसके उड़ते केशों में मैं अपनी उंगलियां फिरा कर उन्हें स्थिर करने का प्रयास कर रहा था/ अस्ताचल की ओर झुकता जाता सूर्य चंदा के स्निग्ध सौंदर्य को और भी
लावण्यमय बना रहा था/ शाम के उस झुटपुटे में, अपने पहलू में बैठी चंदा की ठोड़ी उठाकर मैंने उसकी
आँखों में झांका तो वहाँ एक दूसरी नीली जमुना
हिलोरें मार रही थी/ मैंने उसकी आँखों पर हौले से
अपने होंठ रख दिए तो वह बोली', तुम्हारी ही चीज हूँ,
मुझे अपनी बाहों का

No comments:
Post a Comment