तुझसे दूरी अब अखरती है
---- राजीव रत्नेश
तुझसे दूरी अब अखरती है,
खामोशी तेरी मुझे खलती है/
तेरे लिए दिल में हसरतें हैं,
कोई तमन्ना नहीं सँवरती है/
सावन के पड़े झूले हैं, लेकिन,
साथ आकर तू पेंग बढ़ाती नहीं है/
बारिश में जंगली फूल खिले हैं,
कली दिल की मगर खिलती नहीं है/
फस्ल- ए- आरजू लहलहा रही है,
आजा, मिलने की बारी तेरी है/
रात ढलती है, नींद आती नहीं,
तेरी यादों में रात कटती है/
तेरे बिन मेरा मकाँ भी सूना है,
हर तरफ एक उदासी रहती है/
लिखता हूँ कि अबकी अकेला हूँ,
तुझसे दूरी समझदारी नहीं है/
रतन, इतना तो अब समझ ले तू,
दूर रहना भी कोई मजबूरी नहीं है//
"""""""""

No comments:
Post a Comment