राजीव जी, यह रचना “ईश्वर” आपके अब तक के लेखन से कुछ अलग धरातल पर है। इसमें ईश्वर को केवल धार्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि, परिवर्तन, मनुष्य और प्रेम—इन सबमें व्याप्त एक अदृश्य सत्ता के रूप में देखने का प्रयास है।
मुझे इसमें विशेष रूप से अंतिम दो पद बहुत प्रभावी लगे। वहाँ अमूर्त ईश्वर धीरे-धीरे एक साक्षात, अनुभूत उपस्थिति बन जाता है। यही इस रचना का सबसे सुंदर भाव-परिवर्तन है।
मैंने मूल भावों को बचाते हुए भाषा, प्रवाह और कुछ दोहराव को थोड़ा सँवारकर इसे इस रूप में देखा है—
ईश्वर
— राजीव रत्नेश
कोई तो है जो हम सबका नियमन करता है,
मैं और तुम नहीं, कोई और तो है,
चाँद-तारों को अपनी चाल में चलाता है।
पृथ्वी को एक धुरी पर घुमाता है,
कोई तो है इस सृष्टि का संस्थापक,
जो भले हमें नज़र नहीं आता है।
परिवर्तन के चक्र में वह हर कहीं है,
मौसम बदलता है, वह सामने नहीं आता,
कुछ तो बात है—जो हमें नज़र नहीं आता है।
हममें, तुममें, व्यापक—सबमें संस्थित कोई तो है,
उसको मैं आज तक जान-समझ नहीं पाया,
गाँधी, बुद्ध, ईसा—सब उसी के नज़राने हैं।
आकृति उसी की है, समर्पण भाव से ध्याते हैं,
सब कुछ पाकर ही उसका ध्यान लगाते हैं,
तर्क के सहारे आज तक उसे पहचान न पाए।
माथे से लगाते जिसका तिलक, रोली और चंदन,
वही राम और कृष्ण के रूप में नज़र आता है,
जानकर भी आज तक कोई उसे जान न पाया।
स्वयं कहा है—“सम्भवामि युगे-युगे”, अवतार लेता है,
इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हूँ, फिर भी मन समझ न पाया,
जीवन-प्राण देकर जो मुझे उद्बुद्ध करता है,
उस रहस्य को मेरा मन आज तक जान न पाया।
भक्ति-भाव से चरणों में बस दो फूल ही तो रखे थे,
प्रेम की बगिया में वह बहार बनकर आया,
नामकरण कर न सका—ईश्वर समझकर ही उसे पूजा।
कठिन वक्त में भी उसने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा,
उसके श्यामल, सुकोमल दर्शन से वंचित भी न रहा,
उसे स्वीकार किया—वह मेरे लिए साक्षात ईश्वर था।
एक बात विशेष रूप से कहूँगा: अंतिम शेर में आपकी रचना का पूरा रहस्य खुलता है। आरंभ में कवि पूछता है—“कोई तो है”, और अंत में उसी खोज का उत्तर किसी दार्शनिक प्रमाण में नहीं, बल्कि अनुभव में मिलता है—“वह मेरे लिए साक्षात ईश्वर था।”
इसलिए मैं इसमें बहुत अधिक कठिन या संस्कृतनिष्ठ शब्द जोड़ना उचित नहीं समझूँगा। आपकी वही सरल, आत्मीय और अनुभव से निकली हुई भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

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