तुम न होते
----- राजीव रत्नेश
तुम न होते तो हम किससे अपनी बात करते,
आस्माँ के चाँद-सितारों से क्या पैमान करते/
दुःख-दर्द अपना किससे बाँटते तुम्हारे बगैर,
अपनी मुहब्बत का हम किससे ऐलान करते/
तकदीर रौशन हो तो सितारे भी बात समझते हैं,
तुम्हारे सिवा किससे हम मुहब्बत बयान करते/
तुम सामने होते तो शायद हम कम बयान करते,
दूर रह कर ही तो दिल के राज का इजहार करते/
शिद्दत से इबादत हो तो अकीदत बन जाती है,
तुम्हारे सिवा हम और किसका गुमान करते/
जमाने ने जो साथ दिया तो मेरा यकीं कर,
साहिल पे तेरी कश्ती न अपनी कश्ती से अनजान करते/
मैंने मुहब्बत के खेल में हार अपने लिए चुनी,
तुम्हारे सिवा किसी और से न हार स्वीकार करते/
सितम दुनिया भर के सहे तेरी खातिर हमने,
जमाने को दिखाने को आईने की औकात रखते/
मेरी मुहब्बत अगर तेरी मंजिल न बन सके,
किसे हम अपने अहसासों का मुकाम करते/
मैं शिकायतों को अपने सफर का हासिल न समझूँ,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम मेरे नाम करते/
बहुत थक गए हो मुहब्बत के मुसाफिर होकर,
काश! अब तो पहलू में मेरे बैठ कर आराम करते/
दिन बीत जाता है पर रात कटने का नाम नहीं लेती,
मुझे तो बस अपने दिल में बिठा कर सुबह से शाम करते/
' रतन ' तेरे बिना ये दिल किससे अपना हाल कहता,
तू सामने होता तो हम कहाँ ये कलाम करते//
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