---- राजीव रत्नेश " रतन "
भूमिका:
मंजिल की तलाश में निकले मुसाफिर के लिए रास्ते
कभी हमकदम बनते हैं, कभी दगा देते हैं/ यह गजल उसी
सफर की है, जिसमें साथी छूट गया, पर रास्ते अब भी उसी
को पुकारते हैं/
गजल:
निकले मंजिल के वास्ते, गाते ये रास्ते,
चलते-चलते हमकदम बन जाते ये रास्ते/
कोहसारों ने दरक कर राह दी उन्हें,
जहाँ रात हुई, ठिकाना दिलाते ये रास्ते/
नदियों ने आखिरश हमें रोका नहीं,
हम बढ़ते गए, हाथ बढ़ाते ये रास्ते/
चार दिन की चाँदनी है मेहमानवाजी,
बाद उसके बदल जाते ये रास्ते/
जब खून के रिश्ते भी दगा कर जाते हैं,
कैसा होता है सफर, बताते ये रास्ते/
माना सफर तवील था, मगर इतना भी नहीं,
कि साथ छोड़ना भी सिखाते ये रास्ते/
हर मोड़ पर " रतन " ने तुम्हें दी सदा,
वफा न सही, तुम्हें ही बुलाते ये रास्ते//
शब्दार्थ:
कोहसार: पहाड़
दरकना: फटना, दरार पड़ना
आखिरश: आखिरकार
मेहमान नवाजी: अतिथि-सत्कार
दगा: धोखा
तवील: लंबा
सदा: पुकार, आवाज
खंजर: कटार
वफा: निष्ठा, निभाना
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