Friday, November 20, 2009

बिन मौसम ही ........!!!!!!

अजी आली जनाब आए हैं
हाथों में खाली गिलास लाये हैं
अभी भर जायेंगे पैमाने
आंखों मे वो शराब लाये हैं ।
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तुमसे मुलाक़ात बरसों बाद हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

पहले की तरह तुम्हारा हाथ चूमना चाहा
पर तुम अपनी जगह से हट गई
तुम बदल गए हो या मैं ही
गिला होठों में आकर अटक गयी ।
पूछा ऐसे तुमने क्यों होने दिया
मुहब्बत रस्मोरिवाज़ मे भटक गयी ।

महफ़िल में फ़िर हसीं रात हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

मेरा पैमाना फ़िर भरा तुमने
जाम लबों से लगाया तुमने
नज़र झुका के ही बात की
ख़ुद पीने की बात से किया इनकार तुमने
मैं भी पीने की बात से मुकर गया
ख़ुद पिलाने से हाथ खींच लिया तुमने

बिन मौसम ही चमन दिल मे बरसात हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई

बरसो रहे तुम गुमशुदा सबसे
अब मिले तो हो के शादीशुदा हमसे
ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाया या बारे गम
ये राज़ भी तुमने छुपाया हमसे
पहले भी क्या हम इतने गैर थे
बिना पूछे ही सब कुछ कहती थी मुझसे

अब तो दुश्मन सारी कायनात हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

पहले तो साथ मेरे हर कहीं जाती थी
रेस्तराओं में बैठ कर लिम्का पीती थी
मेरे साथ मीठा पान अक्सर खाती थी
मर्ज़ी से अपने सारे प्रोग्राम बताती थी
तुम मेरी अपनी ही हो ................
बात बात में ये बात जतलाती थी

भड़कते शोलों पर मुहब्बत परवान हुई
हसरतों के साथ ये वारदात हुई ।

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