मुकम्मल होने को अब सिर्फ हमारा नसीब है/
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क्रांति के नारों से शुरू हुआ था जो एक अफसाना/
जमुना के तट से गुजरा, बना फिर एक जमाना/
रतन ने पाया चंदा को, चंदा ने पाया अपना रतन,
मुकम्मल हुई तहरीर, पूरा हुआ मुहब्बत का अफसाना//
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क्रांति के नारों के बीच वो चाय की चुस्कियां,
वो पगडडियाँ, वो सेवा और चंदा की नजदीकियाँ/
इतिहास लिखेगा जब भी, जे ० पी ० के दीवानों का नाम,
रतन की तहरीर में गूंजेगा, बनारस के साथ चंदा का नाम/
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कलम रुकी थी जरा, थमी नहीं है अभी,
दास्तां- ए- वफा, पूरी हुई नहीं है अभी
अभी तो अस्ल में मुसलसल प्यार जारी है
नतीजा अभियान का पूरा हुआ नहीं है अभी//
अभियान के कमेंट्स पर आधारित
राजीव रत्नेश
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