Wednesday, July 7, 2010

अच्छा हुआ .......!!!!!!!!!!

अच्छा हुआ मुझे प्यार मे,
कामयाबी न मिली
मिल भी जाती तो जान भी
सलामत न होती ।

नाकर्दा गुनाहों की कुछ
इस तरह मिली सज़ा
पराई तो पराई अपनी
भी साथ छुड़ा गयी ।

ये नहीं था कि उसे मेरे
पहले प्यार की नहीं थी खबर
साथ देने को उसने किया
वादा फिर वादे से मुकर गयी ।

कारण अज्ञात भी नहीं
ये सदियों से होता आया है ,
मुफलिसों पे काबिज़ हो जाती है
पैसे वालो की हस्ती ।

जब से आया शबाब मुझ पर
निभा रहा हूं जफायी का बोझ
अगर वो वफ़ा निभाती तो क्या
फिर भी क्या नीचे की ज़मीन खिसक जाती ।

पहाड़ की छोटी सर करने की
नीयत दिल पर चोट कर गयी ,
ढूँढने को समंदर से मोती
मेरी चाहत सीपियों से बहल गयी ।

मेरा क्या है आधी से ज्यादा
शबेगम काट चुका हूं ।
बाकी जो बची है जुदाई के गम मे
जिंदगी बिखर जाएगी ।

मुहब्बत का फ़साना
हमेशा रहा है अधूरा
जग जानता है फरहाद को
जीते जी शीरी न मिल पायी ।

हम पहले बेखौफ थे
अपनी मुहब्बत से
जानते न थे वो तकदीर की
खलाओ मे गूम हो जाएगी ।

मैं मंजिल की तरफ
बद्ध जा रहा था
ठोकर लगी तो जाना
उधर वो था मकतल की जानिब ।

बरसात अच्छी लगती थी
खटकती है अब बुरी तरह
चाँदनी चाँद की अब
तन badan मे आग लगाती ।

'रतन' को गिला नहीं किसी से
अपनी तकदीर पे है भरोसा
कभी तो मिलेगी 'ताज'
शहर मे रह कर जो दुबारा नहीं मिलते !!!

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