हकीकते- इश्क इनको ( कविता )
++++++++++++++++++++++
हसीं अक्सर मुजस्सिम बुते- जफा होती है/
सारी कायनात पर अपनी जहाँगीरी रखती हैं/
शोर-शराबे और हंगामें होते हैं पसंद इनको,
खल्वत में इनकी नानी भी मरती है/
जमाने भर को अपना मुद्दई समलती हैं,
आखिरशः किसी से न दिल लगाती हैं/
अपना बना कर, निकम्मा कर के ही बाज आती हैं,
खुद समझती नहीं, प्यार का दाँव लगाती हैं/
अपना समझ कर ही तो इनसे फरेब खाया,
अपने आगे किसी को न कुछ समझती हैं/
मुहब्बत परचून की दुकान का माल समझती हैं,
बिना हींग- फिटकरी लगाए ही चोखा खाती हैं/
हमने भी तो इन्हें दिल से न याद किया कभी,
जानते-समझते थे, ये बरबाद- तबीयत होती हैं/
इश्क का न ये मुकम्मल फलसफा होती हैं,
दिली धड़कता है जरूर, भेजे से सफा होती हैं/
हमने कभी न कहा कि हमसे दिल लगाओ,
छेड़ मुहब्बत का तराना, साजे- वफा तोड़ देती हैं/
मुहब्बत में इनके बरबाद होते-होते आखिर बचे,
काँटे का चारा हजम कर भी मछली नहीं फँसती है/
बरबाद मुहब्बत का फसाना न सुनायेंगे " रतन",
हकीकते- इश्क इनको महशर में समझ आती है
राजीव रत्नेश
"""""""""""""""""""

No comments:
Post a Comment