वह अपनी ही नजर में सदा ( गजल )
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तुमको पाया, सब कुछ मेरे पास रहा/
तुमको खोया, दिल बहुत उदास रहा/
सोचा था, तुमसे कुछ न कहेंगे हम,
पास पाया तो दिल में एक एहसास रहा/
जमाने ने दिए, गम के अंबार, मगर,
तुमको देखा तो जीने का विश्वास रहा/
किसी ने दिए खुशियों के खजाने,
किसी के हिस्से, गम का आभास रहा/
जबरन किया व्यर्थ- विवाद हमने,
कहाँ जन्म-जन्म का विश्वास रहा/
जख्म पर मरहम लगाने चले तो थे,
आते-आते मगर सब प्रयास रहा/
देखा मेरा उन्मुक्त- व्यवहार दुनिया ने,
भावनाओं का फिर भी उपहास रहा/
सागर की उत्ताल तरंगे भी थमीं,
देख मेरा भावों का विस्तार रहा/
जीवन नदिया की बहती धारा है,
किसी ठौर न इसका निवास रहा/
सुबह का सूरज, शाम को डूब गया,
उम्र बीतने का दिल में आभास रहा/
कितना पाया, कितना कुछ गंवाया,
जीवन भर इसका न कोई ख्याल रहा/
गए थे समंदर से मोती लाने,
गहराई का मगर न एहसास रहा/
अपनी दुनिया में रहना सीखा हमने,
भीड़ में भी अपना अलग निवास रहा/
आस्मान में दूधिया रोशनी बिखरी,
चंद्र- किरणों में अद्मुत प्रकाश रहा/
" रतन" को कौन दुनिया में खरीद सका,
वह अपनी ही नजर में सदा खास रहा//
राजीव रत्नेश
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