Friday, January 25, 2008

arsaa_e_zindgi....!!!!!


अरसा_ऐ_जिंदगी गुजरी तेरे इंतज़ार मे,
बाम पर तुम ना आए दिलाने यकीन भी .

खता हमसे हुई जो तुझे बेंतेहन चाहा ,
तुमसे कोई गिला नही किसी सूरत अभी ही.

बरहना_सर घूमती है मौत हम भी तैयार है,
राहों मे मिल जाओ, ना बोलो कभी भी.

शब् को मिले सहर को बिछड़ भी गए ,
दिल ने कहा वह अब भी बैठी है रूठी ही .

बहुत कुछ कहना था अब खामोश हो गए,
अहले ज़माने ने कहा सजी है बज्म तेरी अभी .

कहना आसान है चार लफ्ज़ मुहब्बत के,
उल्फत तुझे आती नही वफ़ा न किया कभी भी.

तेरा किस्सा बयान किया हमने महफिलों में,
भूल जा उस बेवफा को कहने लगे रकीब भी .

कतरा _कतरा लहू टपका आखो से "रतन" ,
कुछ न चाहिए ताज तुझसे मिलने की मर्ज़ी नही !!!!!!

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