ये तूने क्या किया ( कविता )
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प्यार में बेवफा! ये तूने क्या किया,
सजाते- सजाते मेरा घर, गैर का घर सजा दिया/
मुहब्बत तुझे मुझसे थी या गैर से,
बसाते- बसाते मेरा घर, गैर का घर बसा दिया/
यकीन न था मुझे कि तू रास्ता बदलेगी,
किस बात का तूने मुझसे आखिर बदला लिया/
नैरंगियाँ इश्क की छाई थी तेरी महफिल में,
किस बात पे तूने मेरी मुहब्बत से किनारा किया/
किफायतशार थी तो पहले से ही,
मुफ्त में गैर के घर की रौनक बनी/
मेरी दुनिया लूटी पहले फिर,
गैर का भी चैनो- सुकूं लूट लिया/
बरसी बदली घटा घनघोर थी,
तेरी जवानी का यूँ मन- मयूर थिरक उठा/
मैं बढ़ जाता तेरी ओर,
पर जाते-जाते संभल गया/
क्या सोच कर तूने मेरी बगिया से,
ताजा खिला गुलाब तुमने अनायास तोड़ा/
मस्त- मलंग थी तो मुझसे निबाहा होता,
प्यार मुझसे किया, गैर का घर तूने जोड़ा/
सादा- ओ- मासूम तो पहले तू न थी,
किस नाज से अपना बनाया घरौंदा तोड़ा/
बेतरह चाहा था जिसे, आज मुझसे ही,
तूने हर रिश्ता खत्म किया, गैर से निबाहा/
दूरी कुछ भी न थी तेरे- मेरे घर के बीच,
फिर क्यूँ बहाना तूने दूरी का बनाया
मैं तुझसे दूर रह नहीं सकता,
ये जान कर भी तूने दबदबा बनाया/
तू दिलशाद रही, तेरा दिल आबाद रहा,
तू दिलबाग रही, मैं दिले- बरबाद रहा/
फिर क्यूँ मेरे शहर में आके,
अपने हाथ से तूने पत्थर मारा/
गैर अजीज था तो पहले ही बताया होता,
अरे ओ बेवफा! दिल तो न मेरा लिया होता/
तेरी किस्मत के मारे तो और भी थे,
उनसे भी अपना निबाह कर लिया होता/
गैरों से अजमीयत थी तेरे इश्क की,
तो मुझको जाल में न फंसाया होता/
करके बरबाद मुझे तूने गैर के साथ,
कम से कम अपना घर तो न बसाया होता/
तुझे दे देता छूट मैं पहले ही,
काश! मुझे पहले से ही बताया होता/
कसूरवार तुझे न ठहराता कभी,
तूने इरादा अपना पहले जतलाया होता/
"""""""""""" राजीव रत्नेश
फलसफा इश्क का ये तूने औरों को भी तो सुनाया होगा/
मैं कैसे यकीं कर लूँ कि मेरे बारे में उनको न बताया होगा//
राजीव रत्नेश
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