याराना लगता है
---- राजीव रत्नेश
शिकवा अब तुझसे कैसा, तेरा-मेरा याराना लगता है,
तेरा मिलना या न मिलना, अब भी तेरा बहाना लगता है/
कितना आसान है कहना भी कि तू मेरी है, मगर,
तेरे- मेरे बीच का फासला भी पुराना लगता है/
गुज़र गईं दिल से अभी-अभी, दफ्न हुईं कई दास्तानें,
तेरे- मेरे साथ का फिर भी साफ- सुथरा अफसाना लगता है/
जमाने को मेरी दरियादिली शायद पसंद न थी, इसलिए,
तुझको- मुझसे दूर करने का उसका नया बहाना लगता है/
रोज-रोज की कवायद तेरे घर तक की शाम- ए- गम हो गई है,
मुझे तो आज का चाँद भी कुछ नया-नया सा लगता है/
बरबादियों का मेरे जश्न मनाया रकीबों ने जोर-शोर से,
मुझे तो उनका शोर- ओ- गुल भी उस्तादाना लगता है/
कश्ती को साहिल से लगने नहीं देने की तमन्ना है मेरी,
यूँ ही बस हवा में पतवार चलाना मुझे अच्छा लगता है/
आस्माँ से उतरे हों जैसे सितारे जमीं पर,
तू मुझे अपने लिए फ़लक का नजराना लगता है/
गिर कर जो नहीं उठते, अपने साथ बुरा करते हैं,
गिरना नहीं होता बुरा, उनको समझाना पड़ता है/
सिल्सिले से राहों में इश्क के बढ़ना हर हाल सही है,
दफअतन किसी के गले पड़ना नहीं अच्छा लगता है/
झिलमिलाती चाँदनी में जरा एक बार नहा कर तो देखो,
शफ्फाक बदन भी बिन श्रृंगार कहाँ अच्छा लगता है/
राजीव, अब शिकवा भी क्या उस बेवफा से कीजिए,
जिसका हर एक जख्म भी अपना- सा पुराना लगता है/
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