Thursday, September 24, 2026

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ५१ से६० )

सौगात५१----- नई सुबह का आगाज

पचास के पड़ाव ने एक नई उम्मीद जगाई है,
कलम ने फिर से कागज से वफा की कसम खाई है/

मंजिल अभी दूर है पर हौसला कम नहीं ' रतन ',
हमने तो हर अँधेरी रात के बाद एक नई सुबह पाई है/

 ' पूजा ' के उन्हीं पतवारों को फिर से थाम लिया हमने,
लहरों ने फिर से हमें ललकार कर आवाज लगाई है/

सौगात ५२----- रिश्तों की धूप

रिश्तों की इस कड़ी धूप में यादों की छाँव बड़ी है,
जो बीते बीते कल की बातें थीं आज आँखों में खड़ी हैं/

मुठ्ठीगंज की उन गलियों का वो बचपन याद आता है,
जहाँ बिना किसी मतलब के खुशियाँ बाजार में पड़ी थीं/

अब तो नोएडा की इन दीवारों में सन्नाटा गूँजता है ' रतन ',
वो पुराने यार, वो पुरानी बातें, बस अब यादों की कड़ी हैं/

सौगात ५३ ------- इंसानियत का मोल

चेहरे पे चेहरा लगा कर, यहाँ लोग घूमते हैं,
इंसानियत को छोड़ कर, पत्थरों को चूमते हैं/

हमने तो गरीब की आह में, खुदा को ढूँढा ' रतन ',
जबकि लोग महलों की रौनक में, बेसुध होकर झूमते हैं/

 ' तहरीर ' में जो लिखा है, उसे अमल में ला सकूँ तो जानूँ,
वरना शब्दों के ये जाल तो हर तरफ ही झूमते हैं/

सौगात ५४------- वफा की महक

फूलों की उम्र तो बस एक दिन की होती है,
पर वफा की महक सदियों तक नहीं खोती है/

हमने जो बीज बोए थे मोहब्बत और यकीन के ' रतन ',
आज उनकी फसल मेरी रूह के आँगन में सोती है/

जमाना लाख कोशिश करे, हमें मिटाने की यहाँ,
पर दुआओं की ये माला कभी नहीं खोती है/

सौगात ५५------- वक्त का तराजू

वक्त के तराजू में खुद को तौल कर देखा हमने,
भारी निकला हमारा दर्द और खुशियाँ कमजोर निकलीं/

पर उस दर्द में भी एक अजब सी लज्जत थी ' रतन ',
कि हर ठोकर के बाद मेरी शरिव्सयत और निखरी/

' तहरीर- ए- रतन ' के ये पन्ने गवाह हैं इस बात के,
कि जमाने की हर चाल मेरे यकीन के आगे कमजोर निकली/

सौगात ५६-------- मुखौटों का बाजार

बाजार लगा है मुखौटों का, हर चेहरा बिकाऊ है,
यहाँ सच की कीमत कम और झूठ बड़ा टिकाऊ है/

हमने तो अपनी सादगी का दामन नहीं छोड़ा ' रतन ',
चाहे जमाना कहे कि हमारा अंदाज पुराना और ऊबाऊ है/

जिसकी रूह में चमक हो उसे श्रृंगार की क्या जरूरत,
चेबाहरी चमक-दमक तो बस दुनिया के लिए दिखाऊ है/

सौगात ५७-------- ' स्मृति शेष ' ( इलाहाबाद की एक शाम )

यादों के उस पुराने बक्से में एक शाम दबी बैठी है,
जो इलाहाबाद के संगम- तट पे हमसे कभी रुठी थी/

वो कुल्हड़ वाली चाय और दोस्तों की वो महफिल,
अब नोएडा की इन इमारतों में कहीं खो सी गई है/

' रतन ' आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है अकेला,
जहाँ जिन्दगी की रफ्तार हमसे कहीं पीछे छूट गई है/

सौगात ५८-------- कलम और करुणा

मेरी कलम जब भी चली किसी के आँसू पोंछने को,
खुदा की कसम, मुझे अपनी इबादत मुकम्मल लगी/

सिर्फ शब्दों को सजाना मेरा मकसद नही ' रतन ',
जब तक किसी दुःखी दिल को मेरी बात मरहम न लगी/

' तहरीर ' वही सच्ची है जो इंसानियत का दर्द बाँट ले,
वरना कागज काले करने वालों की यहाँ बड़ी भीड़ लगी/

सौगात ५९-------- सब्र का फल

आँधियों ने बहुत कोशिश की मेरा आशियाना उजाड़ने की,
पूर ' पूजा ' के यकीन की बुनियाद बड़ी ही गहरी थी/

हम चुप रहे तो दुनिया ने समझा कि हम हार गए,
उन्हें क्या पता कि हमारे सब्र की गहराई, बड़ी ही गहरी थी/

' रतन ' ने तो वक्त को ही अपना गुरु मान लिया,
अब हर  मुश्किल की लहर हमारे आगे ठहरी थी/

सौगात ६०-------' षष्ठी पूर्ति '  ( साठवीं सोपान )

साठ सौगातें साठ अनुभवों की एक माला है,
जिसे हमने बड़े जतन से अपने दिल में पाला है/

आधा रास्ता कब बीत गया, पता ही न चला ' रतन ',
अब तो मंजिल की चमक से हर तरफ उजाला है/

कलम अभी थकी नहीं, न स्याही ही कम हुई है,
अभी तो सौ का आंकड़ा छूने का जज्बा निराला है/

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!