हम जिस पर मर रहें हैं
वो चीज़ ही है कुछ और
जहाँ मे दूसरा नहीं
उसके सिवा कोई और ।
बना रहा था खुदा जाने कब से
चाँद सितारों को
भूले से बन गया उससे
वही बस मेरा और ।
हमें भी यकीन था
उसके वादे का
शाम को मिलने का वादा था
पूछा तो बोले वो शाम थी और
तगाफुल न हुआ उससे कभी
हक मार दिया किसी का और
माना वो ज़हीनो से ज़हीन है
उसका भी नहीं कोई और ।
ये बात अजीब लगती है
क्यो नही उसका और
पुछा तो बोली इठला कर
दीवाना तुमसे नहीं और ।
फूलों से नाज़ुक लब हैं
शफ्फाक नहीं कोई और
संग तराश हार गए
नही बन सका उससे और ।
हम ही है की लफ्जों में
पीरों के बनाया बेमिसाल
वरना शायरी का भी
होता है कोई और _छोर ।
शिकवा उससे नहीं
ज़माने से है गिला
जिसे हम चाहते रहे
पर मिला कोई और ।
मिसाल नहीं कहीं
उसके शबाब का और
माहताब शर्मा जाता है
छुओ जाता है चकोर ।
शबनम कहू उसे या
कहू सीप मे पला मोत्ती
और क्या कहें ताज को
'रतन' का भी नही कोई और ॥ !!!!!!!
Monday, July 20, 2009
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