Monday, July 20, 2009

हम फ़िर से..!!!

हम फ़िर से बिछड़ गए
फ़िर कभी न मिलने के लिए
आंधी तूफ़ान से भी न डरेंगे
मुहब्बत का चिराग दिल मे जलाएं ।

गिला शिकवा कोई तुमसे नहीं
जमाना ही जब दीवार बने
रूहों राग से तुम आशना
फ़िर भी लाखों ज़ख्म दिए ।

हम पहचान न पाए तुमको
तुम हमें जान न सके
हैफ ! बिना नज़रें उठाये क्यो
तुम बगल से गुज़र गए ।

आसमान सर पे उठाएंगे
जो तुम हमसफ़र न मिले
अब तुमसे क्या मिलेंगे
जब ख़ुद से कभी मिल न सके ।

तमाम जलालत झेली हमने
एक राज़_ऐ_परदा दारी के लिए
क्त्त्त्तार तुमने निकाली दफतन
जान निकली भी तो किसके लिए ।

मयकदे मे लुत्फ़ था बेपनाह
जब तक पिलाया साकी ने
जाम की भी क्या भला क्या औकात
पीते थे पैमाना पैमाने से टकरा के ।

किसी ने प्यार किया किसी के लिए खेल
हुस्न के तेवर रोज़ बदलते नए_नए
इल्तजा है यही तुमसे अब 'रतन'
दो हिम्मत ताज को हादसे से उबरने के लिए .... !!!

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