Wednesday, August 25, 2010

उसूल ..........!!!

वैसे तो तुम्ही ने मुझे बर्बाद किया है
इलज़ाम किसी और पे जाये तो अच्छा ,
मैं भी बदल जाऊंगा , बदल दूंगा उसूल
न लूँगा अपने सर इलज़ाम किसी का ।




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ये क्यों हम लोग उसूल बनाते रहते हैं
और जिंदगी भर उनको संभालते_ संभालते मर जाते है ।

क्या वे ज्यादा सुखी हैं जो उसूल बदल देते हैं
और मौका पड़ने पर गधे को बाप स्वीकारें ।

लोग अपने उसूल के लिए क्या नहीं करते
जान जाए पर उसूल से नहीं समझौता करते ।

हम इस तरह उसूल निभा रहें हैं गोया
किसी तरह अपने कंधे पर अपने को dho रहें हैं ।

हम ने ही हर किसी पर आँख मूँद विश्वास किया
असल मे जिंदगी भर सापों को दूध पिलाते रहे ।

हमारा विश्वास करे न कोई हो सकता है
अब हम भी किसी दिन अपना उसूल बदल दें ।

और सापों को काट ले तो पानी भी न मांगे
सापों को घर से निकलने को आस्तीन फाड़ लेंगे ।

क्या उसूल सदा अछे ही होते रहे हैं आज तक
उसूल पर चलने वालों ने अपनी आँखें fudwa ली ।

क्रोस पर चढ़ गए चमड़ी भी अपनी udhadwaa ली
पर उसूल नहीं बदला भले जान ही दे दी ।

हम सोचते हैं उसूल का मतलब क्या होता है
जो अपनी oar आते हुए तीर के लिए ढाल भी न उठाये ।

अहिंसा परमोधर्मः कह कर गला क्यों कटवाया जाये
इससे तो अच्छा है 'रतन' दुश्मन से दूर_ दूर रहे ।

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