Sunday, August 8, 2010

patthar se na maaro.... !!!

मेरा अस्तित्व बौना हो गया है
सुनकर तेरा इनकार ।
सुना था ऊँचे महलों मे
रहने वाले होते हैं ,
ठिगने और छुद्र विचारों के ।
पर मेरी कुटिया ही अब
धराशायी हो गयी है ।

और मैं सोचता हूं
मैंने ऐसा क्या लिख दिया
तुम मान गए बुरा
और मांगने लगे बलिदान ।

बुद्धि दौडाता हूं पर ,
अपने को विवेकहीन
और संज्ञाशून्य पाता हूं ।
मुझ पर भारी पद रही
तेरी हर फुफकार ।

अपनी कलम से विवश हूं
ये कभी नहीं मानती हार ।
और मेरे मन और आत्मा
के संघर्ष में भी
अभिव्यक्त कर देती है
मेरे भाव ।


फिर भी स्नेह त्वरित हो
तुमने प्यार की गढ़ ली कुटिया ।
धर पत्र पवित्र कर दो
भूल की सारी त्रुटियाँ ।
अब न तुमसे कोई
सवाल करूँगा
जानता हूं झूठें हैं
सारे रिश्ते नाते
झूठा जगत का व्यवहार ।

खल रहा स्वयं को अब
अपना ही उत्कर्ष ,
पर्वतों की छोटी पर
जाना छोड़ ,
अब समुद्र की गहराई
मापने की बात करूँगा ,
और अपने अन्तस्थल मे
कोई नया प्रतिबिम्ब
न उभरने दूंगा
यह भीष्म प्रतिज्ञा विकराल ।

देख कर तुम्हारा भीषण सत्कार
यूँ लगा जैसे अंधे को
अर्पण आईना कर दिया हो ।
बाजू कटवा लिए
ताजमहल तामीर कर के ,
फिर तोहफे मे
हीरे की अंगूठी पाकर
कुछ ऐसा लगा
सूरत से हो शबनम
सीरत से हो चिंगारी ,
हम गर्दन झुका कर आये
तुमने निकाली आरी ।


काश !
मेरा दिल मोम सा न होता
और न तुम हौसला रखते ,
पत्थर से वार करने का
क्या यही था अंतिम सत्य
जीवन का निषकर्ष ।
सदीयाँ बीत गयी
शायद किसी ने कहा हो
जमाने से ,
पत्थर से न मारो
मेरे दीवाने को !!!

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