जिधर तू कहे, उधर चलें ( गजल)
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यौवन- तरुवर के पात झड़ चले/
अब भी आ जाओ तो गगन में उड़ चलें/
उड़ गए सब पंछी, डाल पहले छोड़ चले,
अब किसी से दुश्मनी- दोस्ती समझ चले/
याराना था मेरा सारी दुनिया के दीवानों से,
अपने जो थे, छोड़ अकेला, छोड़ जग चले/
बैठे थे जहाज पर, बीच समंदर कहाँ जाते,
उड़कर फिर वापस जहाज पर जम पाते/
संभल जाओ अब भी, सब पहले नाता तोड़ेंगे,
कुंडली मारे बैठी नागिन, कब जाने डस डाले/
मतलब के सब बंदे, इस चार दिन के मेले में,
गया कोई न लौटा, कितने छोड़ हमें अकेले/
संभलना ही तो नआया, एक चोट के बाद दूजी खाए,
उन्होंने वफा न सीखी, मुहब्बत में उनकी हम मिट चले/
दूर से आ रही शहनाई की गूँज, सुन लेने दो,
दिल भरा नहीं, चलो हम भी उधर चलें/
सबका किया भरोसा, कोई भी काम न आया,
अकेले ही आए हैं, अकेले ही अब चलें/
जिधर गए सब, छोड़ यहीं अपनी वीरासत,
तेरी मर्जी के माफिक' रतन', जिधर कहे उधर चलें//
राजीव रत्नेश
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