आखिर रतन ने भला तेरा ( गजल )
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तेरी यादों पर नियंत्रण लगाया है/
तब कहीं जीवन संयमित पाया है/
तू जान न सका, न ही समझा मुझे,
पाकर तुझे मैंने सीप में मोती पाया है/
निर्झर गिरते तेरी आँखों से,
वादियों में प्यार के जल-प्रपात छाया है/
मैं तुझे जान-बूझ कर अनदेखा करता हूँ,
समझ- बूझ कर तूने, लहजा शिकवा का बनाया है/
इस बात का कोई गम नहीं, भूला तू मुझको,
मैंने भी तो इस दिल से मूरत तेरी हटाया है/
साहिल तक ही साथ, तेरा-मेरा था रोज का,
जाकर बस तूने खारे पानी से चेहरा धोया है/
महबूब मेरे अब जाकर किसी से भी शिकवा कर,
वार न तेरा आज तक मुझ पर कहीं चल पाया है/
ऐ गुलबदन! जाने- चमन! शाने- महफिल थे कभी,
तेरे बिना चमन बेनूर, महफिल में गम का साया है/
अंदाज तेरा शायराना, बातें तेरी तिलस्माना,
तेरा फुसूँ मुझ पर तो कभी न तेरा चल पाया है/
बहारों में घूमो, नज्जार- ए- शौक में रहो,
तेरा फन, आखिर किस तरह मुझे भुलाया है/
मजरूह न कभी दिल मेरा, तेरा न मुंतजिर,
सिर्फ तुझे तेरी याद के समंदर से निकाला है/
तेरे होठों पर वो रस- विचुंबित जाम छलक रहा,
सच बता, मेरे सिवा किसी और को पिलाया है/
कहीं न चला जब तेरा जादू , वार मुझ पर किया,
आखिर" रतन" ने ही भला तेरा क्या बिगाड़ा है//
राजीव रत्नेश
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