लोग शोर से डरते हैं, मैं सन्नाटों से प्यार करता हूँ,
यहाँ मैं खुद से मिलता हूँ, और खुद का ही इंतजार करता हूँ/
बहुत भीड़ थी दुनिया में, जहाँ पहचान खो गई थी मेरी,
अब अपनी खामोशी में ही, अपना विस्तार करता हूँ/
' रतन ' को किसी महफिल की अब जरूरत न रही,
मैं अपनी कलम की आवाज से ही अब इकरार करता हूँ/
सौगात ७२ ----------- संस्कारों की पूँजी
विरासत में हमें कोई महल या जागीर न मिली,
पर संस्कारों की वो पूँजी मिली, जो कभी कम न हुई/
मुठ्ठीगंज के उन बुजुर्गों की दुआएँ साथ हैं मेरे,
इसलिए नोएडा की इस चकाचौंध में, आँखें नम न हुईं/
' रतन ' ने सादगी को ही अपना गहना मान लिया,
कि सच्ची अमीरी वही है, जो कभी बरहम न हुई/
सौगात ७३ ------------- विश्वास का लंगर
जब नाव डगमगाई तो ' पूजा ' का नाम याद आया,
लहरों के उस शोर में, बस वही पैगाम याद आया/
हमने तो छोड़ दी थी उम्मीद, साहिल पे पहुँचने की,
पर डूबते को तिनके की तरह, वो इबादत का काम याद आया/
' रतन ' अब तूफानों से डरना कैसा, जब मांझी वो खुद है,
हमें तो उस पतवार से, अपना अटूट यकीन याद आया/
सौगात ७४ ------------- दुआओं का हिसाब
हमने कभी दुनिया से अपना हक नहीं माँगा,
बस खुदा से सबकी खुशियों का, थोड़ा-सा हिस्सा माँगा/
लोग माँगते रहे दौलत, शोहरत और ऊँचे मकाम ' रतन ',
हमने तो बस अपनों के चेहरे पर, नूर का एक किस्सा माँगा/
सत्तर के पार भी ये कलम, इसीलिए जवान है मेरी,
कि मैंने हर दुआ में, सबका भला और वफा का हिस्सा माँगा/
सौगात ७५ -------- तीन चौथाई ( पचहत्तर की सौगात )
पचहत्तर सौगातें, जीवन के तीन चौथाई सफर का आईना है,
यहाँ हर अनुभव कड़वा है, तो हर याद एक सुहाना बहाना है/
अब मंजिल की लकीरें, साफ दिखने लगी हैं ' रतन ',
अब तो बस इस तहरीर को, दुनिया के दिल तक पहुँचाना है/
सफर का आखिरी हिस्सा, सबसे खूबसूरत होगा,
कि अब तो बस रूह को, रुह से मिलाना होगा/
सौगात ७६ ------------ मंथरा का दौर
आज के दौर में मंथरा हर घर में नहीं, हर मन में रहती है,
जो रिश्तों के बीच जहर की धीरे से धार बहती है/
हमने तो राम बनने की कोशिश में, सब कुछ त्याग दिया,
पर ये दुनिया है कि बस, अपनों से ही दूरियाँ सहती है/
' रतन ' संभल कर चलना, इस कलयुगी समाज में,
यहाँ मीठी बातों के पीछे, साजिशों की गहरी नदी बहती है/
सौगात ७७ ---------------- सच का लिबास
झूठ के रेशमी कपड़ों से, सच का टाट भला होता है,
जो रूह को सुकून दे, वही घाट भला होता है/
दिखावे की दुनिया में, सब कुछ बिक जाता है ' रतन ',
पर जो अपने उसूलों पे टिका रहे, वही ठाठ भला होता है/
हमने तो सच्चाई को ही, अपना ओढ़ना- बिछौना बना लिया,
कि अंत में तो बस, नेक- नीयती का पाठ भला होता है/
सौगात ७८ -------------- यादों का कारवाँ
मुठ्ठीगंज से नोएडा तक, यादों का एक लंबा सफर है,
हर मोड़ पे एक कहानी, और हर कहानी में एक असर है/
कभी संगम की लहरें थीं, कभी यमुना का किनारा था,
आज इन कंक्रीट के जंगलों में, बस यादों का ही घर है/
' रतन ' ने तो हर शहर को अपना ही प्यार दिया,
पर अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू का, आज भी वही असर है/
सौगात ७९ --------------- विश्वास की मशाल
जब रास्ते अँधेरे हों, तो अपनी मशाल खुद बनना,
दूसरों के भरोसे जीने से बेहतर, अपनी आग में जलना/
' पूजा ' के नाम का जो सहारा मिला है हमें ' रतन ',
उसी के दम पे सीखा है हमने, हर तूफान से लड़ना/
गिरने का खौफ उन्हें होता है, जो जमीन से नहीं जुड़े,
हमने तो मिट्टी से ही सीखा है, हर हाल में सँभलना/
सौगात ८० ---------------- अस्सी का पड़ाव
अस्सी सौगातें, अस्सी अनुभवों की एक गहरी किताब है,
यहाँ हर सवाल का जवाब और हर दुःख का हिसाब है/
अब मंजिल का दरवाजा, बस दस्तक का इंतजार कर रहा है,
कि ' तहरीर- ए- रतन ' का सपना, अब हकीकत का गुलाब है/
बीस कदम और बाकी हैं, इस महायज्ञ को पूरा करने में,
फिर तो बस खुशियों का जाम, और यादों का शबाब है/
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