एक जमाने के बाद आई मुझे याद
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राजीव रत्नेश
तसव्वुर में तेरे बिलखती रही पैमाने की याद,
एक जमाने के बाद आई मुझे मयखाने की याद/
दिल में आहें भर रही है, बाल बिखराए हुए,
लड़खड़ाने, गुनगुनाने, नाचने-गाने की याद/
नजरों से जब वो बेतकल्लुफ हो पिलाने लगे,
नसीब मेरे चटके हुए उस पुराने पैमाने की याद/
काले बादलों में गुम है आज मेरा चाँद,
बुझी शमा के धुँए में जैसे परवाने की याद/
मकबरों से आ रही है शाम के धुँधलके में,
एक- एक रफीक के बिछड़ जाने की याद/
भूलने की कोशिश भी बेतरह करता हूँ,
रहती है दिल में फिर भी तेरे अफसाने की याद/
कातिल मेरा मुझे ढूँढता रहा पूरे शहर में,
लौटा भी तब, जब आम हुई उसके गुजर जाने की बात
सीना खोल कर उसके सामने आ भी सकता हूँ कैसे,
वो हैं पुराने तीरंदाज, मुझे अब भी उनके निशाने की याद/
छोड़ कर मुझे तन्हा वो सफर पर चला गया,
कसकती है आज भी मुझे उस बेगाने की याद/
आई है रह-रह के गिरती बिजलियों के रूप में,
एक शब उनके पर्दा उठा कर आने की याद/
सूरज की पहली किरन ने जब पहले गुल को परखा,
दिल ने किए रात के सारे नजराने की याद/
राजीव, रात गई तो लगा सब भूल गया हूँ,
फिर दिल ने चुपके से दिलाए उसी जमाने की याद//
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