एक पंथ दो काज होगा ( कविता)
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याद तेरी बरबस आती है
कभी ज्यादा तो कभी कम आती है
इस जिन्दगी का क्या भरोसा
सांस जबकि थम के आती है
यादों की घटा घनघोर है
बादलों का गर्जन झकझोर है
हम तुझे अब क्या समझाएँ
मुझे बस तेरी बातों का जोर है
जैसे-जैसे मैं बढ़ता जाता हूँ
तू कोमल कमनीय होती जाती है
समंदर से निकली प्यार की मोती है तू
स्फटिक चाँदनी है, बड़ी रमणीक है तू
गीत मनोहर, स्वर वीणा के मंद हुए
मंद-मंद तू मुस्कराती है
सुन मेरे गीत मधुर
हिय में ही हरषाती है
मघुबन में तो राधा थिरके
तू संग सखियों के राग अलापे
मृगछौने इधर- उधर भागे
कान्हा की वंशी जब गूँजे
बरसाने में उत्सव है
आज यहाँ कन्हैया पधारे
गोकुल में हो जैसे त्यौहार
हर तरफ बहते दूध के धारे
मक्खन, दही आज नबचेगा
ग्वाल- सरवा को छक के भोग लगेगा
मंदिर- मंदिर गोपियाँ दर्शन करेंगी
कान्हा अब द्वारिकाधीश कहाएंगे
गोपियाँ पकड़ राह आगे-आगे चलेंगी
दूध बिकेगा, दर्शन भी कान्हा के होंगे
एक पंथ दो काज होगा
दूध के दाम, दर्शन बेदाम मिलेंगे
चलो सखी एक बार हम भी
घूम आएँ मथुरा और बरसाने
नैन- चकोर, कृष्ण दर्शन को प्यासे
लगेगी जीवन- नैया तभी किनारे//
राजीव रत्नेश
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