दास्तान- ए- गम
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---- राजीव रत्नेश
महफिल में उसकी हर बात पे सजा,
लब खामोश थे, राह रोके थी हया/
कुछ तो बात न थी हमारे दरमियाँ,
बिना बात ही सर पे उठा लिया आस्माँ/
नवाजिश- ओ- खैर कम हमसे करते न बना,
दूर होता गया वो, हम देते रहे सदा/
पहले नहीं था वो मिसाल- ए नकहत- ए- जाँ,
बन सका न कभी वो अच्छा राजदाँ/
तीर- ए- नजर से ही सबको कर गया घायल,
और भी असलहे उसके पास थे जमा/
सुनाते- सुनाते अपनी दास्तान- ए- गम,
पहलू में ही मेरे वो लंबा हो लिया/
कुछ तो बात है, जो चुप लगाए बैठी है,
खामोश होने वाली न थी उसकी जुबाँ/
नतीजा कुछ न निकला, हो गया अलविदा,
राब्ता हमसे भी न था, हो गया खुद से जुदा/
एक टीस थी दिल में, वो बरकरार है अभी तक,
वरना सब कुछ तो हमने कर दिया है बयाँ/
राजीव, दास्तान तो पूरी हुई मगर ये सच है,
दिल की बात रह गई, बाकी सब था बयाँ/
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