फैसला तुझ पर छोड़ा है
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------ राजीव रत्नेश
तू कुछ इस तरह से मुझसे बगलगीर होकर बात करती है,
कि तेरे बदन की बास मेरे नथुनों में आकर सिमटती
है/
मैं अनजान तो नहीं तेरे इश्क के फैलाए गए झूठे अफसाने से,
सरोवर की मछली जैसे काँटे का चारा हजम कर किनारे मचलती है/
मैंने तेरे पहले किसी से कहीं कोई वायदा निभाने का
इकरार नहीं किया था,
एक तू है कि वादाखिलाफी के लिए मुझे आज भी
मजबूर करती है/
जिन सहारों का तुझे यकीन था एक जमाने से, अपने
कारनामों के लिए,
वो सब तेरा भरम ही निकला, पूछती है अब हवा तू
क्या महसूस करती है/
रंगीन- मिजाजी तेरी सिर्फ दिखने भर की चीज है, कोई खासियत नहीं तुझमे,
तेरे उपवन में घूम-घूम ऐ गुलचीं देखा मैंने, वो तेरी
अहमियत नहीं समझती है/
दो खिले गुलाब थे तेरी निगहबानी में, तेरी होशियारी
काम न आई,
एक खुद-ब-खुद दूर चली गई, दूसरी मुझसे तेरा झूठा
किस्सा कहती है/
मुँहजोर नहीं तू, पर तेरी ये तो काबलियत मेरे समझ
नहीं आती है,
तुझे क्या समझा था और तू अपने को मेरे कदमों की
धूल समझती है/
अनवरत- संघर्ष तेरा मेरे जीने-मरने के भी किसी तरह
काम न आया,
नीली छतरी वाले की सौगात समझ कर ही तुझे
जगह दिल में दी है/
एक घरौंदा जो बचपन में हमने- तुमने अपने हाथों से
तामीर किया था,
उसमें रहने वाली गुड़िया क्या इतनी बड़ी हुई कि मक्खी नाक पर बैठने नहीं देती है/
इकरार किया था तुझसे, प्यार किया था तुझसे ही कहीं मैंने,
किस डाल पर तुमने नशेमन बनाया अपना, किसी को
पता नहीं बताती है/
ढूँढ लेगा ' रतन ' तुझे घोर- घने- जंगल के अंधियारे
में भी,
फैसला तुझ पर छोड़ा है, मेरे पास आती है या जंगल
का रास्ता अपनाती है//
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