अलविदा मेरे इश्क अलविदा
----- राजीव रत्नेश
तेरा-मेरा प्यार क्या सचमुच ही बिल्कुल एकतरफा था,
खुदा का खौफ करो और बताओ, क्या तुमने मुझे नहीं चाहा था/
मेरी नादान वफा ने तेरे सिवा किसी को न पूछा,
तू ही एक मेरी थी, मेरी मुहब्बत को तेरा ही आसरा था/
जज्ब हुए अरमान सीने में, दम घुटा तेरी छिछली चाहत में,
खुदा की इतनी बड़ी कायनात में एक तू ही तो मेरा था/
आँधी- अंधड़ चले, तूफान भी आए मेरी राहों में,
दिल में तेरी मुहब्बत का दीप जलाए मुझे सिर्फ इंतजार तेरा था/
कौन जाने अब तू कहाँ भटक रही होगी, किस हाल में होगी,
बिना किसी बात के तो तेरा अफसाना न मैंने लिखा था/
बादल बरस के निकल गया, चाँद भी आस्मान में खिल गया,
तेरा ही झूठा वादा था आने का, मैं जानता था, तुझे तो
न आना था/
फलसफा- ए- इश्क तेरा-मेरा क्या यूँ ही आधा-अधूरा
ही रहेगा,
जमीन- आसमान के कुलाबे मिलाने वाली बता, किस बात का झगड़ा था/
फरमान तेरे बाप का ही था, मुझे तेरी शादी में न बुलाने का,
पर मुझे तो आखिरी बार ही सही, तुझसे मिलने तो
आना था/.
गम को फरहत दिखाने की तेरी कोशिश भी भरपूर
थी,
नकहते- गुल भी था, दरिया की लहरें भी झूमती गाती, सुनसान बस किनारा था/
शहर के किसी ब्यूटी- पार्लर में कसमसाती बैठी रही
होगी घंटों,
तेरी दिखावटी शादी में हलाल हो गए कितने बकरे, अम्मा के खैर मनाते/
जानता था, मुँह अँधेरे ही तू कल निकल जाएगी, इंतजार किसका करेगी,
मेरे पहुँचने से पहले ही तेरी बस को शहर से निकल
जाना था/
सुबह-सवेरे सूरज की पहली किरन ने जब झकझोर
कर मुझे जगाया,
तू ही मेरा ख्वाब भी थी, हकीकत में भी तुझे ही जाना था/
दम घुटता था मेरा तेरी घनी जुल्फों की कड़ी गिरफ्तारी में,
तुमने जुल्फ छटवा दी तो मुझे भी अब आजाद ही हो
जाना था/
जमुना बहाव पे थी और तेरा भी शहर से गुजर जाना
था,
मेरे पास बचा क्या था, मुझे तो दरिया में बस कूद ही
तो जाना था/
अब फिर कब और किन हालात में मिलना होगा, अलविदा मेरे इश्क अलविदा,
रतन, जानता था, जमाने को तो तेरे खिलाफ हो ही
जाना था/
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