Sunday, May 31, 2026

लिखने लगे हैं फिर से रतन ( गजल)

लिखने लगे हैं फिर से रतन  ( गजल)
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फिर से जवां हो गईं, मुहब्बत की निशानियाँ/
भुला दीं जब हमने रंजो- गम की सारी परेशानियां/

दस्तूरे- मुहब्बत निभा भी दिया, उनको बुला भी लिया,
रक्स करने लगीं फिर से दिल में अंगड़ाइयाँ/

फिर से घटाओं को बुलाओ, गड़गड़ाहटें सुनो,
भींग जाए बदन, भींग जाएँ गोरियों की चोलियाँ/

मिलना सखियों से जब तो शर्माना किस बात का,
दिखाओ सुर्ख रुख्सार उन्हें, बताओ प्यार की निशानियाँ/

कोरे कागद पे लिख दो कोई तो सलाम पी के नाम,
इस भरी पूरी बारिश ने खोले सारे राजे- मस्तानियाँ/

हम तो संभल कर ही राहे- मुहब्बत में आगे बढ़े थे,
किधर से आईं, छा गईं किस्मत पे काली बदलियाँ/

मौसम से कोई वादा- तगादा, हमने तो न किया,
आई कहाँ से याद उसको हमारी निगहबानियाँ/

लिखते-लिखते भी फलसफा क्या अधूरा रह जाएगा,
हमारे हरम की यादें और बुतों की तीमारदारियाँ/

हम नहीं चाहते राजे- मुहब्बत हमेशा राज ही रहे,
औराक खोल दिए मकतबे- इश्क के, झेले फिकरे- 
फब्तियाँ/

होंगे एक दिन बेकार के अहसासे- गैरत जमाने के जुदा,
बढ़ जाएँगी जब हद से तेरी मुहब्बत की सरगोशियाँ/

फिर से दिखाओ, फिर से सुनाओ मुहब्बत की कहानियाँ,
लिखने लगे हैं फिर से ' रतन' गजल और रुबाइयाँ//

                 राजीव रत्नेश
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वक्त थमता रहेगा, जमाना सुनता रहेगा,
रतन जब तक तेरे नाम की रुबाइयाँ बुनता रहेगा//

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