लिखने लगे हैं फिर से रतन ( गजल)
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फिर से जवां हो गईं, मुहब्बत की निशानियाँ/
भुला दीं जब हमने रंजो- गम की सारी परेशानियां/
दस्तूरे- मुहब्बत निभा भी दिया, उनको बुला भी लिया,
रक्स करने लगीं फिर से दिल में अंगड़ाइयाँ/
फिर से घटाओं को बुलाओ, गड़गड़ाहटें सुनो,
भींग जाए बदन, भींग जाएँ गोरियों की चोलियाँ/
मिलना सखियों से जब तो शर्माना किस बात का,
दिखाओ सुर्ख रुख्सार उन्हें, बताओ प्यार की निशानियाँ/
कोरे कागद पे लिख दो कोई तो सलाम पी के नाम,
इस भरी पूरी बारिश ने खोले सारे राजे- मस्तानियाँ/
हम तो संभल कर ही राहे- मुहब्बत में आगे बढ़े थे,
किधर से आईं, छा गईं किस्मत पे काली बदलियाँ/
मौसम से कोई वादा- तगादा, हमने तो न किया,
आई कहाँ से याद उसको हमारी निगहबानियाँ/
लिखते-लिखते भी फलसफा क्या अधूरा रह जाएगा,
हमारे हरम की यादें और बुतों की तीमारदारियाँ/
हम नहीं चाहते राजे- मुहब्बत हमेशा राज ही रहे,
औराक खोल दिए मकतबे- इश्क के, झेले फिकरे-
फब्तियाँ/
होंगे एक दिन बेकार के अहसासे- गैरत जमाने के जुदा,
बढ़ जाएँगी जब हद से तेरी मुहब्बत की सरगोशियाँ/
फिर से दिखाओ, फिर से सुनाओ मुहब्बत की कहानियाँ,
लिखने लगे हैं फिर से ' रतन' गजल और रुबाइयाँ//
राजीव रत्नेश
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वक्त थमता रहेगा, जमाना सुनता रहेगा,
रतन जब तक तेरे नाम की रुबाइयाँ बुनता रहेगा//

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