मुझे नहीं लगता ( गजल)
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जाने क्यूँ संशय है, वफा की राह में दूर तलक साथ
निभाओगी मेरा/
कभी- कभी लगता मुझे, बीच सफर से लौट जाओगी
छोड़ मुझे अकेला/
हम- तुम फ्लैट में ही अबकी कुछ ज्यादा दिन ही रह
लिए,
चलो खुली हवा में घूम आएँ, बुलाता हमें जमुना का
किनारा/
हाथों में थामे पापकार्न, चलो घूम आएँ नदिया के उस
पार,
सैर कराने को नाव से अपने, रोज हमें बुलाता मछुआरा/
रहे शहर की आबादियों में खासे दिन धरना दिए हुए
हम,
चलो अबकी गर्मियों में घूम आएँ फिर बलिया का शहीद पार्क/
याद दिलाते अपने गाँव का घर, खण्डहर वीरानियों
के,
करें आबाद फिर मयकदा, पिएँ फिर से मठ्ठा और
खाएँ भुना बाजरा/
हाथों में हाथ थामे, घूमें रोज सरयू नदी के किनारे हम
दोनों,
लौटते में ले आएँ साथ अपने ककड़ी, खीरा और
हिनमाना/
मुँह अँधेरे हम नहाने जाएँ, बिना घाट की कलकल बहती सरयू मइय्या,
तट पर ही कपड़े बदलें, गहरे में न जा किनारे ही हम
नहाएं/
आकर रसोई में तुम मछली तलना और भर-भर गिलास देना ताड़ी,
हम तुम साथ- साथ खाएँ पिएँ, बाहों में बाहें डाल कर
बेसुध सोएँ/
जागने के पहले हमारे, रख जाएगा हमारे बगीचे का
रखवाला,
हमारे लिए रसीले- सुनहरे आम और पके जामुन
कजरारे/
जब तक घर से बुलावा नआए, मस्त रहें और मस्ती में
घूमें,
जाने को हो शहर तो ऐसे जाएँ, जैसे कुछ भी न हो
हमारा/
तेरा प्यार खुल्लम खुल्ला देता है मेरे डूबते दिल को
दिलासा,
तेरे भीनी सुगंध वाले गेसुओं की कैद से रिहाई का नहीं मेरा इरादा/
यूँ भी तेरी आँखों में बिलकती नीली जमुना देती मुझे
सहारा,
मुझे नहीं लगता' रतन', टूटेगा कभी बंधन, जिसमें तूने
मुझे बाँधा//
राजीव रत्नेश
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सरयू की कलकल में आज फिर वो पुराना तराना है,
चंदा ने कह दिया रतन से," ये बंधन तो सदियों पुराना है/

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