Monday, May 25, 2026

दो कितआत एक शेर

महलों की पाबंदियों से खुली हवा में निकल आया हूँ,
हवेलियों की निगहबानियों से भी अब निकल आया हूँ,
दिल के चिराग को बार- बार तो जलाया है मैंने,
वक़्त के थपेड़ों को भीतर ही भीतर जज्ब किया है मैंने/

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अहले- दुनिया हमें बार- बार मना करते रहे/
हम हवा के सामने रौशन शमां करते रहे/
कौन कहता है, मुखालफत तुम्हारी की,
तेरे शौक के सामां ही तुझे पेश करते रहे//

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इधर भी है सिवा कुछ, उधर की मजबूरी,
न उनसे बताए बने, न उनसे छिपाए बने/

           राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!