महलों की पाबंदियों से खुली हवा में निकल आया हूँ,
हवेलियों की निगहबानियों से भी अब निकल आया हूँ,
दिल के चिराग को बार- बार तो जलाया है मैंने,
वक़्त के थपेड़ों को भीतर ही भीतर जज्ब किया है मैंने/
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अहले- दुनिया हमें बार- बार मना करते रहे/
हम हवा के सामने रौशन शमां करते रहे/
कौन कहता है, मुखालफत तुम्हारी की,
तेरे शौक के सामां ही तुझे पेश करते रहे//
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इधर भी है सिवा कुछ, उधर की मजबूरी,
न उनसे बताए बने, न उनसे छिपाए बने/
राजीव रत्नेश
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