तूने ही बीच मँझधार में छुड़ाया हाथ!
लगाए थे तमाम झूठे इल्जामात;
तर्ज- ए- तब्बसुम अब न कर पाएगा घात!
तुझे बहाव की जानिब छोड़ दिया था;
खुद किनारे लगो; मिले झाड़-झंखाड़!
दूर देश में अटकी तेरी साँस;
मैं अपने शहर में; कैसे मिलाता हाथ!
बाग में सब क्या कली; क्या गुलाब!
तूने किया था मुझे; हवाले सय्याद!
राजीव रत्नेश

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