Saturday, June 7, 2025

कैसे देता तेरा साथ( कविता३)

मैं कैसे देता वक्त पर तेरा साथ;
तूने ही बीच मँझधार में छुड़ाया हाथ!

लगाए थे तमाम झूठे इल्जामात;
तर्ज- ए- तब्बसुम अब न कर पाएगा घात!

तुझे बहाव की जानिब छोड़ दिया था;
खुद किनारे लगो; मिले झाड़-झंखाड़!

दूर देश में अटकी तेरी साँस;
मैं अपने शहर में; कैसे मिलाता हाथ!

बाग में सब क्या कली; क्या गुलाब!
तूने किया था मुझे; हवाले सय्याद!

          राजीव रत्नेश

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