Saturday, June 7, 2025

तुझे तो खुद साहिल पे ( कविता१)

न आने का तेरा बहाना था;
बहाना ढूँढ के तुझे आना था!
चौतरफा तपिश है सूरज की;
आ जा तुझे कुछ समझाना था!

अफसाना तेरा- मेरा पुराना है;
बच के सबसे तुझे आना था!
आरजू- ए- दिल मचलती है;
किसी तरह सूरत दिखलाना था!

गम-ए- रुस्वाई साथ न देगी;
तेरे साथ तो सारा जमाना था!
गदराया बदन; शर्मीली तेरी आँखें
तुझे खुद मेरे पास आ जाना था!

आया हूँ खुद तुझे मनाने के लिए;
तुझे नजरें तो न चुराना था!
तेरे - मेरे बीच वही परदा पुराना है;
अपने हुस्न का दीवाना न बनाना था!

गर्दिश में रहे तो रहे जमाना
तुझे हर हाल जमाने से टकराना था!
माँगी थी मिठाई; तेरे होंठों की;
तुझे तो बस; एक जाम पिलाना था!

हुस्न- ओ- इश्क का खूबसूरत मेल हो जाता;
मुझे तुझे अकेले में अपने पास बुलाना था! 
पहुँंच आया हूँ तुझ तक डगमगाती कश्ती में;
तुझे तो खुद ही साहिल पे आ जाना था!

          राजीव रत्नेश

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