Sunday, June 8, 2025

जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है( कविता२)

दिखाने को तू रोज शरारत करती है;
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!

बाद- ए- नसीम अंगड़ाइयाँ लेता है;
फूलों से निशानी लेता है!
फिजाँ में खुशबू फैलाता है;
चूम तुझे धीमे से लेता है!
कलियाँ चटकने से बाज नहीं आती हैं;
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!

अंदाजे मुहब्बत; जोहराजबीं तू है;
मेरे दिल में छुपी; मेरी नबी तू है!
राख पड़ी आग पे; कुरेद तू देती है;
शोलों को और भड़का देती है!
तुझे किसकी सोहबत असर करती है? .
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!

याद तेरी; दिल की बगिया में सहेजा है;से पहले
फूलो की खुशबू; इधर ही आ जा!
दिल में समा जा; चेहरा दिखा जा;
दिल में मेरे तमन्नाएँ सजा जा!
दिल में उल्फत भी असर करती है;
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!

मैं तुझसे मिलना चाहता हूँ;
तू छिपना भी खूब जानती है!
तेरी-मेरी क्या औकात; तू जाने;
बात मेरे समझ में आती है
खुदा के सिवा तू किसकी अकीदत करती है?
जानता हूँ; इ मुझसे मुहब्बत करती है!

बदरा; बिजली जाने; मै न जानूँ;
किस मौसम में; तू बाहर निकलती है?
हाथ एक बार ही तेरा पकड़ा है;
रोज तू हाथ छुड़ाने की बात करती है!
नहीं जानता प्यार की किस्मत क्या है?
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!

अंधड़- आँधी चले; मौसम बदले;
तुझे पड़ता कोई फर्क नहीं!
तेरे चेहरे की खुशियाँ; बिजली ले गई;
मेरे दामन की खुशियाँ चुक गईं!
तू सिवा; किसी और की हसरत करती है?
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!

बढ़ना हुआ मंजिल की तरफ;
तो खुदा से मैंने दुआ मांगी!
तेरा- मेरा साथ बना रहे हमेशा;
बात तेरे सिवा कुछ न चाही!
कटनी चाहती है; फुरसत की बात करती है;
जानता हूँ; तू मुझसे मुहब्बत करती है!
           राजीव रत्नेश


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