पैर रोज नापते थे; उमंगों का जंगल!
याद थी तेरी खला की मृगमरीचिका;
सीने में लहरें मारता हुआ समन्दर!
शीरीं होंठों की मिठास फिजाँ में फैली;
फूलों से उपवन में; करते भौंरे पान पराग!
पेट परथा मस्सा तो बाँए हाथ पे तिल;
यही कुछ थे तेरे जीवन की जागीर!
उमड़ते बादल; पत्ते जर्द हरे हुए;
जंगल में नाचे मोर; झूम के आया सावन!
चंचल तेरी चितवन; नैननक्श अभिराम;
कुछ तो जुगत करो; मुरली वाले धनश्याम!
नहीं समझे कहीं से तुझे अबला; असहाय
तलवार और नजरों के तीर तेरे हथियार!
तेरी चाल मस्तानी; समझ न पाया' रतन'
टिकोरे बगीचे के; हो गए कब आम!
राजीव रत्नेश

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