Monday, June 2, 2025

वरना फिर कब मिलना हो( गजल१)

सितमगर सोच तुझे हासिल हुआ क्या आनाकानी से
हम प्यासे तड़पते रहे समंदर बीच नमकीन पानी में

मेरी नहीं तो सुन जमाने की दिली तर्जेबयानी
तीरेनजर तेरे असर कर गए भरी मेरी जवानी में

अलमस्त बहार तू है तू ही मेरे दिल की रानी है
तेरे लबों से तेरे दामन से तपिशे मंजर मिटानी है

चली दिल पे शमशीर तेरी बत कही पुरानी से
साहिल से तुले देखते रहे उफनाते हुए पानी में

गरज मेरी ये कि मिल जाए एक जाम तेरे हाथों से
वरना फिर कब मिलना हो हों जब सारे मंजर पानी में

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