Wednesday, June 4, 2025

भूल गया रहे- मधुशाला ( कविता५)

चाँदनी रात में वो मेरे पास थी;
उसके दहन; मेरे दहन;
एक दूसरेको सुना रहे थे दास्तां?

एक चाँद गगन में था;
एक मेरे बगल में था;
लीन थे परस्पर बेसाख्ता?

रात की डगर सो गई थी;
सहर की डगर से जा मिली थी;
चमन से था उसे वास्ता?

नींद मुझ पर तारी थी;
रात उसपे भारी थी;
सुना रही थी हुब्बेवतन की दास्तां?

श्रद्धा- सुमन भर अँजुली में;
गया शहीदों की बस्ती में;
पूछा कहकशां से रास्ता?

कंपित काया; सुचिता- बाला;
ढाली जीवन में रस का प्याला;
भूल गया' रतन' रहे मधुशाला?

_______ राजीव रत्नेश_______

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