Tuesday, June 3, 2025

वादे से अपने कौन मुकर गया( कविता)

ये सच है रंगों का त्योहार गुजर गया
वादे से अपने ये कौन मुकर गया
वादाशिकन होगा कोई हमनफस तेरा
मौसमे गुल में कौन तुझे तर कर गया

उल्फतो करम की बातों से तय हुआ रास्ता
बदल गई हर शै तेरा ही था अफसाना
तब्दील होते रहे ख्वाब हकीकत में
पुरखौफ माहौल रास्ता था कंकरीला
टूटने से पहले फूल काँटा बन गया
वादे से अपने ये कौन मुकर गया

एक नूर फिजां में एक खुशबू हवा में
इक नई बात है आज चाँदनी की रिदा में
इशारों इशारों में कह दूंगा न आऊँ जो राहों में
चाल इक नई चल देगा अदा अदा में
बागबां के साथ गुल भी बेबसर हुआ
वादे से अपने ये कौन मुकर गया

ऐलान कर देगा कुफ्लेदहन खुलवा भी देगा
पर कोई दिल की बात कोई सुनाने भी देगा
बातों में इजहार कर देगा उसे भुलाने के लिए
भुलाना चाहूँ तो खुद को भुलाने भी न देगा
सजाए थे मंजर पहलू में दिल मचल गया
वादे से अपने ये कौन मुकर गया

मिटा सके मुझको आए तो कोई रात ऐसी भी
मेरे साथ घटे कोई वारदात ऐसी भी
हमको छीन लाए जो रंजोगम के हाथों से
फलक से उतरे कोई परीजाद ऐसी भी
जिसको अपना बनाया वो बेखबर हुआ
वादे से अपने ये कौन मुकर गया

जिन्हें निस्बत नहीं मेरी ऊँची उड़ानों से
उडूँ तो तीर निकलेंगे हजारों उनकी कमानों से
किसी की सरसब्जी पर न करूँ ऐतराज
चार पौध वो लगवा देगा मेरी गुजरगाहों में
कहाँ मिले थे कहाँ हो सफर गया
वादे से अपने ये कौन मुकर गया

इक पुरानी बात जो इतनी पुरानी भी नहीं
दिल में रखना है मुश्किल और सुनानी भी नहीं
आने वाले दिन गुजरेंगे कैसे तेरे बगैर
बीते मौसम की तो अब कोई निशानी भी नहीं
गजरा गुलाब का शर्मो हया से झर गया
वादे से अपने ये कौन मुकर गया
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अगर साथ मेरे तुम मेरे प्यार में थी
तो प्यार को तुमने निरर्थक कर दिया
धोखा मेरे साथ खुद ही किया
इलजाम सारा मेरे सर मढ़ दिया
_______ राजीव रत्नेश___________

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