Tuesday, June 3, 2025

दोस्ती और प्यार की खीचतान( कविता)

बढ़ा कर इतना आगे अपने प्यार में ये तुमने क्या किया
तुम्हें भुला देने का इसरार करके आँखों में बरसात ला दिया

आगे की राह काँटो भरी है ये मुझे समझा दिया
राहे इश्क से पलट जाने का इजहार कर मुझे रुला दिया

एहतियात बरतते बररते भी फुग्गा तुम्हारा फुला दिया
टिकोरे को तुम्हारे किस तरह रसीला आम बना दिया

प्यार में हरचन्द रुसवाई तो है पर मैं क्या करता
तुमने अपने अंगूर के गुच्छे का चस्का लगा दिया

तुमने मुझे रवानी दी मैं तुम्हें नवजवान बना गया
तुमने मुले प्रेम पुजारी समझा मैं तुममें प्राण प्रतिष्ठा कर गया

बाप से तुम्हारे इसीलिए तुम्हारा हाथ माँगा था
उससे तुम्हारा जीवन भर का साथ माँगा था

पर वो बिदक गया घोड़े की तरह और बाद इसके
तुम्हारा भाई सामने आया और दोस्ती का वास्ता दिया

वह तुम्हें भुला देने कसम देकर शहर बदल करने को कहा
वो ही चाहे तो तुम्हारा शहर बदल करे मैंने भी सुझा दिया

पूछा था क्या तुम्हारा अधोवस्त्र मैंने खोल के देखा था
मैं उसे कैसे बताता कि मैंने क्या क्या नहीं देखा था

तुम्हारे बदन के सारे खालोखद बता सकता था
वह चाहता तो उसे भी तस्दीक करा सकता था

पर वो राजी न हुआ पहले वही चाहता था हमारी शादी हो जाए
और वो मेरी राह तुमसे मिलने में आसान किया करता था

अब कहने लगा था यूनिवर्सिटी जाना छोड़ दो
अपनी पढ़ाई रोक दो और उससे मिलना छोड़ दो

मेरा दोस्त ही विलेन बन गया था मैं उसकी आँख का काँटा
तुमसे वही कहलवाया जो जो अपनी मर्जी से चाहा

जब तक तुम्हारी शादी न हो गई दूसरे शहर चली न गई
तेरी आस में तेरे ही वास्ते मैं तुम्हारी राह से हट न सका

तुम खुद ही गाती थी अपने घरवालों को सुनाती थी
आँखों से मुझको जुबां से घरवालों को बताती थी

' आधा है चंद्रमा रात आधी
रह न जाए तेरी मेरी बात आधी

मेरे महबूब में क्या नहीं क्या नहीं
वो तो है हजारों में इक हसीं

हँसी खुशी कर दो विदा
तुम्हारी बेटी राज करेगी'

होली पर यही सोच कर तुम्हारे गालों को गुलाबी कर दिया था
येथी दिल में तमन्ना इक दिन तेरी माँग भी भरूँगा

पर वह तमन्ना दिल की दिल में ही रह गई
मुझसे अपने प्यार की कीमत न लगाई गई

तू बेशकीमती थी और बेशकीमत था मेरे लिए तेरा प्यार
मेरे पर था शायद तेरे पिछले कई जन्मों का उधार

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तुझे जिस्म से निकाल दिया काँटों की तरह
अपनी फूल सी जिन्दगी को बचाने के लिए

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तेरे साथ बिताए हुए पल याद आते है
मेरे काँधे पर पीछे से आती महक याद आती है
तुम और मैं दो जिस्म मगर इक जां थे
तेरी साँसौ के बीच तेरी खुशबू याद आती है

_____________ राजीव रत्नेश____________

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