Monday, June 2, 2025

सिर्फ तेरी याद है( कविता)

इतने गौर से न देखा था कभी पहले तुझे
तेरी पुरानी तस्वीर देखता हूँ तो सोचता हूँ

बाँए गाल का वो काला तिल कहाँ गया
खूँ की सुर्खी कहाँ गई
लबों की नाजुकी कहाँ गई
पँखारियों का गुलाबीपन कहाँ गया
तीखे नयन नक्श कहाँ गए
आवाज का लचीलापन कहाँ गया

तेरी पुरानी तस्वीर जो देखता हूँ तो सोचता हूँ

मद भरी आँखों का काजल क्या बह गया
या जान बूझ कर तुमने चेहरा धो डाला है
कसा हुआ बदन दोहरा कब हो गया
शायर की कलम में दम कहाँ रहा

तेरी पुरानी तस्वीर जो देखता हूँ तो सोचता हूँ

बढ़चढ कर तुझे हजारों में एक लिखा
तेरे आगे आँख उठा कर किसी को न देखा
पुरानी अदा से अब शेर सुनाने को नहीं कहती
वो तूफानों का शोर दश्त की आग का क्या हुआ

तेरी पुरानी तस्वीर जो देखता हूँ तो सोचता हूँ

शायद अगले मोड़ से ही हम जुदा हुए थे
क्या फिर कभी अब न मिल पाने के लिए
अजनबी रास्तों का शोर तेरी बात करता है
अब क्या जवाब हूँ उसे कि तू कहाँ है

तेरी पुरानी तस्वीर जो देखता हूँ तो सोचता हूँ

कहाँ गईं वो अठखेलियाँ तेरी
जुबिशे लब की थिरकनें सारी 
तेरे दामन की छाँव में महफूज रहा करते थे
तुम मेरी हो मैं तुम्हारा
एक दूजे से कहा करते थे

तेरी पुरानी तस्वीर जो देखता हूँ तो सोचता हूँ

अब न वो मोड़ है न वो गलियाँ
अब धवस्त वो मकां है शेष
जहाँ घंटों बैठा करते थे
जहाँ मिलते थे गलबहियाँ

तेरी पुरानी तस्वीर जो देखता हूँ तो सोचता हूँ
बाँए गाल का वो काला तिल क्या हुआ सोचता हूँ

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