आस्मां ही तो है सर पे उठाए रखिये
जिन्दा दिली इसी का नाम है
कम से कम उंगली उठाए रखिये
कितनी बारिशें आईं तूफान गुजरे
कोहसारों की तरह पैर जमाए रखिये
खुली ने छोडें खिड़कियाँ घर की
घर की बात घर में छिपाये रखिये
कौन जाने कब वो रास्ता भूल जाए
मुहब्बत की शमा जलाए रखिये

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