Sunday, June 1, 2025

बेगाने की शादी में अबदुल्ला दीवाना ( कविता )

करीब था वो लम्हा वो पंखे के साथ शहतीर गिरालेता
या मुझे वो गिरा देता या मैं उसे गिरा देता

इरादा उसका जो मैं समझ न गया होता
जाहिर है हजूम इकठ्ठा हो गया होता

मलखम सर करने की तमन्ना में सरापा तरबतर हुआ
पलटा तो आके बोला काश शीशम का न बना होता

गैर से जो थी आशनाई हमसे कौन सी अदावत थी
मुझसे ज्यादा वह था तेरे घर में ठहरा हुआ

कमां पर रख के तीर तुमने चला दिया
करोना से बचा तो कुत्ते की मौत मारा गया

वो चल दिया तो सितारों से कहा अपना गुरुर
तेरे लबों से जहर हवाओं से ताजियाना गया

करीब था वो लम्हा जब वो अपनी आस्तीन चढ़ा लेता
मैंने गौर किया घर से निकला था हाफशर्ट पहना हुआ

जोर आजमाइश खूब की हर बार नाकाम रहा
फिसल बार बार गया तो बोला शीशम का बना हुआ

मुझे उठा कर स्टूल से सोफे पे बिठा दिया
सच ही कहा है बेगाने की शादी में अबदुल्ला दीवाना

बेअमां मौसम उड़ती धूल गर्द  सारा शहर न होता
मैं जी लेता शबनमी अश्क भी तेरा सामने जो दरिया न होता

भड़ास दिल की निकल गई होती तो अच्छा होता
बाहर निकला तो देखा था वो लारी वाले से भिड़ा हुआ

हिमाकत भी उसकी जो जार जार बोला तड़पती हवाओं से
मैं भी तो उसकी बहन बेटियों के दरम्यान था बैठा हुआ

हिम्मत थी उसकी पुरानी आदत थी हुकमरानी की
कुत्ते ने काट खाया था उसको भरी जवानी में

मैं भी बचा कर लौट आया छोड़कर मुहब्बत का इम्तहान
हर गाम पे वो सिरफिरा था बैठा हुआ तैय्यारी के साथ

पुरजोर कोशिश की पर हिला न पाया तंबू कनात
खड़े खड़े किया  भस्त्रिका और किया अनुलोम विलोम

मार गया हनुमान की भगा देता महफिल के बाहिर
मैं भी तो था पुराना दधीचि का नया अवतार

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