Wednesday, June 4, 2025

आया बसंत का त्यौहार( कविता२)

सौंदर्य से तेरे मैंनहीं अनजान
चलाती तिरछी निगाह से तू कटार
उजले आनन पे काली तिरछी भवें;
हों जैसे तने हुए धनुष पे बांण!

लटें तेरी उलझें ललाट पर;
माथे पे बिन्दी सुकुमार;
नाक में नथ डोले;
होंठ पंखड़ी- ए- गुलाब!

कान में झूमर डोलें
जुल्फ में जुल्फ उलझे;
सागर के सीपी हों जैसे; 
आँखें तेरी मोती लागें!

मांग तेरे सूने- सूने;
गले में मोतियन माला सोहे;
पलकों पे आँसू जैसे;
शबनम की बूँदें जैसे!

गाल पे काला तिल बैठा;
चेहरे पे दरबान जैसे;
आँचल बना दुपट्टा धानी;
होने वाली हो बरसात जैसे!

तेरे यौवन का कसाव;
करता चोली से बलात्कार;
चली मस्त नेवेली नार;
सीने में खंजर उतार!

सुबह को चली चमन में;
मस्तानी मदमाती बयार;
कलियाँ चटकने लगीं;
आया बसंत का त्यौहार!
______ राजीव रत्नेश________

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