Wednesday, June 4, 2025

रतन की बस यही चाह( कविता१)

दिलों का संगम होगा कि नहीं;
तेरा मेरा मिलन होगा कि नहीं; 
तेरे पतले होंठ निमंत्रण देते हैं;
जैसे भँवरे को बुलाता गुलाब!

जैसे फूलों में सुगंध;
काष्ठ में अग्नि व्यापक;
जैसे हिना की पत्तियों में छुपी लाली;
वैसे ही रोम- रोम में बसे भगवान!

स्टीमर बोट चलने से;
वस्तुओं के डूबने-उतराने से;
जन्तुओं के ऊपर आने में;
अपनी महिना में स्थित सागर!

अंतरतम में पाकर तेरा प्यार;
होंठों के खिलते पुष्प बेशुमार;
अपनी आभा से; अपनी ज्याति से सूरज;
करता रौशन पूरी पृथ्वी- आस्मान

लालिमा अस्ताचल में छाता वक्तेशाम;
अनुपम छटा छाती चारोंधाम;
जंगल में नाचे मोर; कुहके कोयल;
राधा संग थिरकें नंद गोपाल!

मंदिरों मे चढ़ते नेवैद्य- थाल;
पंडे छक कर उड़ाते नाल;
नहीं उनका भाव- अभाव;
बजाते फिरते बस गाल!

रतन की बस यही चाह;
कभी तो हों प्रगटित भगवान!
करें उनको वंदन और प्रणाम;
मिल जाएँ कोई पथिक अनजान!
______ राजीव रत्नेश________

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