इतनी बड़ी दुनिया में,
अपना कोई नहीं/
बेकार ढूढ़ता हूँ मैं,
गैरों में भी,
अपने पन का,
कोई अहसास/
और इसी में,
बसर कर देता हूँ,
चंद अपने कीमती लमहात/
और तब भी पाता हूँ,
कहीं गैरियत की बू,
तो बड़ी उमस सी लगती है/
कभी- कभी ऐसा लगता है,
इतनी बड़ी दुनिया में,
अपना कोई नहीं/
राजीव रत्नेश
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