तुम आओ तो ( कविता)
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मैं क्या करूँ, तुम्हारी मस्त निगाह,
नौरवेज जवानी मस्ती भरा पैगाम,
बस्ती- बस्ती, जंगल-जंगल,
मारा-मारा फिरता हूँ,
दिखलाई नहीं पड़ता वो माहताब,
अंगार से दहके रुखसार,
काली नागिन सी जुल्फें,
आँखें ही कर दें सारा हिसाब/
मस्त हवा भी सरसराती है,
दुपहर भी अगन बरसाती है,
चाँद चाँदनी छलकाता है,
तुम्हारी सहेली की पायल बजती है/
मगर तुम कहाँ हो?
कहाँ हो जानेमन!
तुम आओ तो,
सँवार दूँ गलियाँ,
बुहार दूँ तेरे आँसू,
तुमको गले से लगाऊँ,
अपनी बनाऊँ,
इस लंबे अन्तराल को,
मैं सीने से लगाऊँ/
सुरमई आरिज, शीरीं होंठ,
अरमान हो रहे हैं मेरे,
बिलकुल चुरमुरे टोस्ट,
तुम्हारी दिलनवाजी मयस्सर नहीं,
सुबह तो सुबह
शाम हो जाती है बोर,
कितनी बहारें आईं,
रोज आती हैं----
कल भी आएँगी,
मगर तुम न आओगी/
शमअ जलेगी, परवाना आएगा,
साकी मुस्कराएगी,
शराबी झूम-झूम जाएगा,
कल ही तो
मस्त जमाना आएगा,
कल ही तो होगी,
उनकी महफिल रंगीन,
कल ही तो छनकेगी पायल,
कल ही तो मचलेगी जवानी,
कल ही तो लोग पिएँगे जाम,
आज तो खाली-खाली था,
कल ही भरे जाएँगे पैमाने,
पीने को मैं अकेला रहूँगा,
पिलाने को ऐ मेरी साकी!
कल तुम कहाँ रहोगी?
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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