भँवरे ने चूमा गुलाब को ( कविता)
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भँवरे ने चूमा गुलाब को, चमन में इंकलाब आ गया/
सुबह को ही बादल घुमड़ उठे, शाम का नजारा छा गया/
हमनशीं मेरे आए थे दमे- गुलगस्त, देख मुझे मुस्कराए,
आँखों ही आँखों में खलवत में मिलने का इशारा भा
गया/
तुमने ही तो सिखाई थी मुझे, जवाबे- मुहब्बत की अदा,
अब क्या हमीं से तुमको यक- ब- यक शर्माना आ
गया/
पहली दोस्ती तुम्हीं से हुई थी, बाद में दुश्मनी बढ़ाई,
चमन का हर गुल तुम्हारा, बागबां भी हो तुम पर फिदा
गया/
चे चमन, ये गुलजार समझो सब तुम्हारी ही विरासत
है,
इक आस्मां ही तो है, जो कब का मेरा सायबां हो गया/
बदलते मौसम की छींटाकशी के बीच याद तुम्हारी आई,
एक तुम्हीं तो हो हमारे, वो याद तुम्हारा इरादा आ गया/
सनसनाती चली हवा, पुरवाई अंगनाई- अंगनाई बही,
बाजार में अब तो शान से फजला खरबूजा आ गया/
हमने पहले ही तुम्हें बताया था, अब तो बयारे- इश्क
चलेगी,
हुस्न को भी वक्ते- शाम बाम पे आने का याद वादा आ
गया/
भुलाने को जमाने की जिल्लतें, हिकमतें क्या- क्या न कीं
हुस्न जब आया नुक्कड़ पर, जुबां पे सबके ताला आ
गया/
आफातो- मसायब सब मोल लूँ, मंजूर हो गर मिलना
हमसे,
मेरे ख्याल से ही देख, रुख पे तेरे आखिर उजाला आ
गया/
लुत्फ नहीं रहा चाय में, या तो भैंस पानी ज्यादा पी
गई,
या कोई बेअदब पहले ही पतीले में दूध के पानी मिला
गया/
बाग में फूल हैं, गगन में सितारे जगमगाते रातभर तमाम,
हाथ जो बढ़ाया हमने भी, एक हाथ में हमारे सितारा आ गया/
मुहब्बत की दुकान से हम मुफ्त ही तुझे ले आएँगे,
तेरी कीमत पहले से भला कोई कुछ भी लगा गया/
हाले-दिल ने एक बेकस सा खेल खिला अबस दिया,
कोई' रत्न' को ही मकसदन जब नीलाम पे चढ़ा गया/
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चाय के प्याले से जैसे धुँआ निकले,
वैसे ही तुम्हारी आँखों में नशा उमड़े/
चाँदनी रात में तुम्हारी नशीली जवानी,
और जुल्फों से जैसे घटा उमड़े//
मैं मजबूर हूँ तो क्या
तुम्हें भी तो ये आदत नहीं,
दिल मेरा बेकल है और
तुममें जरा भी शराफत नहीं/
दिल में छूटते पटाखे,
तेरे चेहरे पे दीवाली का मंजर,
मुझको तुमसे मुहब्बत है,
कोई अदावत नहीं//
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गम का अफसाना और ये तराना,
जैसे तेरी आँखें बिना निशाना/
चलती तो है कलम मेरी और,
होती है अदा तुम्हारी शायराना//
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बदलियों के मौसम में याद तुम्हारा आना,
याद आना फिर दिल पर छा जाना/
ये आज की नहीं पुरानी आदत है,
तुम्हारा ख्वाबों में आकर फिर चले जाना//
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जिल्लतें उठानी पड़ती हैं,
बदनामी होती है मुहब्बत में/
कहते हैं सभी पर पीछे
रह जाते हैं कुव्वत में/
बहक भी जाते हैं तमाम
वफा की राहों से,
बड़ा ही फर्क रहता है,
मिलने में और जरूरत में//
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मैकदे में कोई साकी
कोई दीवाना न मिला,
मेरी बेताब तमन्नाओं को,
कोई किनारा न मिला/
कातिल रातों की जवानी
का कोई ठिकाना नहीं,
मेरी रूठी नींद को
रातों का सहारा न मिला//
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मेरी न मिलने की गुस्ताखी याद रही
अपनी आँखों का गिला कुछ याद नहीं/
राजीव रत्नेश
मुट्ठीगंज, इलाहाबाद
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