मेरे दिल में अंतर्हित व्याकुलता ( कविता)
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मेरे दिल में अंतर्हित व्याकुलता/
साँसों में बसी एक आकुलता/
नवजीवन की फुलवारी में महकती,
फिर भी कल्लोल की समरसता/
प्रेम का तुम्हारा यह नया व्यापार,
भुला गया हृदय के सारे शुद्ध विचार/
आँखों की भाषा भी छल का आवरण,
जला गई जुल्फों की मस्त बयार/
भटकी फिरी गली- गली गुलनार,
न पा सकी पर किसी का ऐतबार/
नयन के आगे ज्योति का आडंबर,
धुल न सका परिव्यापित तम बेकार/
कली से भ्रमर बार- बार लिपटता/
देख कर बदन की उसके मादकता/
संदेश जीवन का शायद मुझको,
दे जाए मदमाती, बलखाती बयार/
शलभ पागल मैं जल क्षार हुआ,
पा न सका शमां का झूठा ही प्यार/
रही दम से उसके रोशनी चिरागों में,
खुशबू कुन्तलों की बसी हवाओं में/
अद्धनिमीलित आँखों में मस्ती मदिरा की,
आँसू ऐसे, जैसे जल भरा घटाओं में/
मिल- मिल कर प्रियतम फिर-फिर बिछड़ता/
यही सोच-सोच कर पागल हृदय तड़पता/
फँसी जीवन- नौका मँझधार में,
खोजते-खोजते नदिया का किनारा/
साहिल फिर भी पास आ छूट गया,
बिछड़ गया वो दो पल का मीत हमारा/
बसाया था जिसको, आँखों में अपने,
दिखा आँखों को गया था नये सपने/
सितारे करते क्या वफा, चाँद ही बेवफा,
देख यही तीखा उपहास किया जग ने/
भग्न- हृदय में कैसे भाव- सुमन खिलता?
फूलों का मधुबन उजड़ कर कैसे महकता?
मेरे दिल में अंतर्हित व्याकुलता,
साँसों में बसी एक आकुलता//
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एतबार पे जिसके
हमने खुद को मिटाया/
मेरी अर्जे- तमन्ना पे
करते हैं मुझे खुद से जुदा//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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